रविवार, 25 अक्टूबर 2026
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संपादकीय सीमा पर बदल रही युद्ध की तस्वीर चीन से मुकाबले के लिए भारत को क्यों बदलनी होगी रणनीति? आ

धुनिक युद्धों में तकनीक की भूमिका रूस-यूक्रेन और अमेरिका-ईरान के बीच संघर्षों में देखने को मिली है। अब दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने, उसके संचार तंत्र को बाधित करने…

धुनिक युद्धों में तकनीक की भूमिका रूस-यूक्रेन और अमेरिका-ईरान के बीच संघर्षों में देखने को मिली है। अब दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने, उसके संचार तंत्र को बाधित करने और दूर बैठे ही सटीक हमला करने के लिए तकनीक का व्यापक इस्तेमाल किया जा रहा है। विश्व भर में युद्ध का स्वरूप समय के साथ तेजी से बदल रहा है। पहले युद्ध में सैनिकों की संख्या, हथियारों की मारक क्षमता, टैंकों, तोपों और लड़ाकू विमानों की भूमिका निर्णायक मानी जाती थी। मगर अब आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से युद्ध की रणनीति और लड़ने के तरीके, दोनों बदल रहे हैं। ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआइ, साइबर हमले, उपग्रह निगरानी, रोबोटिक हथियार और उन्नत मिसाइल जैसी रक्षा प्रणालियां युद्ध के नए साधन बन गए हैं। ऐसे में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती पड़ोसी मुल्क चीन की बढ़ती तकनीकी और सामरिक क्षमताओं से मुकाबला करने की है। यह बात छिपी नहीं है कि भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव कई बार टकराव में तब्दील हुआ है। खबरों के मुताबिक, डोकलाम और गलवान के घटनाक्रमों के बाद अब अरुणाचल प्रदेश में सीमा पर चीनी सेना की हलचल बढ़ी है। आइटीबीपी के महानिदेशक ने बीते गुरुवार को एक कार्यक्रम में इस चिंता को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया कि चीन के साथ पारंपरिक युद्ध के तरीकों से मुकाबला करने का दौर बीत चुका है और सुरक्षा बल अपने जवानों, हथियारों, वाहनों और सीमा चौकियों के आधुनिकीकरण पर जोर दे रहा है। आधुनिक युद्धों में तकनीक की भूमिका रूस-यूक्रेन और अमेरिका-ईरान के बीच संघर्षों में देखने को मिली है। अब दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने, उसके संचार तंत्र को बाधित करने और दूर बैठे ही सटीक हमला करने के लिए तकनीक का व्यापक इस्तेमाल किया जा रहा है। एआइ की मदद से युद्धक्षेत्र से मिलने वाली सूचनाओं का विश्लेषण करके तेजी से निर्णय लिया जा सकता है। वहीं, साइबर हमलों के जरिए बिजली आपूर्ति, संचार नेटवर्क, बैंकिंग और सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया जा सकता है। इस बदलाव का अर्थ यह है कि अब किसी देश की सैन्य शक्ति केवल उसके सैनिकों और हथियारों की संख्या से नहीं आंकी जा सकती। तकनीकी दक्षता, खुफिया जानकारी, संचार व्यवस्था और विभिन्न सैन्य प्रणालियों के बीच बेहतर तालमेल भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। आइटीबीपी चीन के साथ करीब साढ़े तीन हजार किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा की सुरक्षा करती है। बढ़ती चुनौतियों के बीच इस बल ने अपनी सभी सीमा इकाइयों में ड्रोन प्लाटून गठित की हैं और आधुनिक युद्ध की जरूरतों के मद्देनजर सीमा पर व्यापक भूमिगत ढांचे बनाए जा रहे हैं। भारत के लिए यह बदलाव इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि चीन सैन्य आधुनिकीकरण और नई तकनीकों के विकास पर लगातार जोर दे रहा है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, वह सैन्य निर्णय लेने, निगरानी, खुफिया जानकारी जुटाने और लक्ष्य निर्धारित करने जैसे क्षेत्रों में एआइ के इस्तेमाल को आगे बढ़ा रहा है। ऐसे में भारत को सीमा सुरक्षा के पारंपरिक इंतजामों के साथ-साथ अपनी तकनीकी क्षमता भी मजबूत करनी होगी। अरुणाचल प्रदेश से लगती चीन की सीमा पर मौजूदा तनाव को लेकर विदेश मंत्रालय का कहना है कि मुद्दों को सुलझाने के लिए दोनों पक्षों की ओर से राजनयिक और सैन्य तंत्र का इस्तेमाल किया जा रहा है। मगर, चुनौती केवल सीमा तक सीमित नहीं है, चीन की ओर से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दबदबा बढ़ाने का प्रयास, अंतरिक्ष आधारित निगरानी प्रणालियों का विस्तार और सीमा पार से साइबर सुरक्षा से जुड़े जोखिम भी भारत के लिए रणनीतिक चिंताएं पैदा करते हैं। इसलिए भारत की तैयारी ऐसी होनी चाहिए कि वह किसी एक क्षेत्र में तकनीकी बढ़त पर निर्भर रहने के बजाय सभी मोर्चों पर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित कर सके।

यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 25 अक्टूबर 2026 के अंक में पृष्ठ 9 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें

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सिटी ब्लास्ट, 25 अक्टूबर 2026, पृष्ठ 9