इंदौर। माँ का दूध शिशु के लिए प्रकृति का सबसे संपूर्ण और सुरक्षित आहार माना जाता है। जन्म के तुरंत बाद मिलने वाला पीला गाढ़ा दूध, जिसे कोलोस्ट्रम कहा जाता है, नवजात के लिए प्रथम टीके के समान कार्य करता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ भी जन्म के पहले छह महीनों तक केवल स्तनपान कराने तथा दो वर्ष या उससे अधिक समय तक पूरक आहार के साथ स्तनपान जारी रखने की सलाह देते हैं। इसके बावजूद आधुनिक युवा पीढ़ी के सामने स्तनपान से जुड़ी अनेक चुनौतियाँ उभरकर सामने आ रही हैं।
आज का जीवन तेज गति, व्यस्त दिनचर्या और बढ़ती प्रतिस्पर्धा से भरा हुआ है। युवा माताएँ शिक्षा, करियर और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करती हैं। प्रसव के कुछ ही महीनों बाद नौकरी पर लौटने की आवश्यकता के कारण कई बार स्तनपान की निरंतरता प्रभावित होती है। कार्यस्थलों पर स्तनपान कक्ष, दूध संग्रहण की सुविधा और मातृत्व के अनुकूल वातावरण का अभाव भी एक बड़ी समस्या है। सोशल मीडिया और बदलती जीवनशैली का प्रभाव भी स्तनपान की आदतों पर पड़ रहा है। कई युवा माताएँ शरीर की बनावट में परिवर्तन या सौंदर्य संबंधी धारणाओं के कारण स्तनपान को लेकर संकोच महसूस करती हैं। इंटरनेट पर उपलब्ध अपूर्ण या भ्रामक जानकारी भी भ्रम पैदा करती है। कुछ लोग यह मान लेते हैं कि फार्मूला दूध माँ के दूध का पूर्ण विकल्प है, जबकि वैज्ञानिक शोध से स्पष्ट रूप से जानकारी मिलती है कि माँ के दूध में ऐसे पोषक तत्व, एंटीबॉडी और जैव सक्रिय घटक होते हैं जिन्हें कृत्रिम रूप से पूरी तरह तैयार नहीं किया जा सकता। दूध पिलाते समय माँ और बच्चे के बीच त्वचा से त्वचा का छूना (स्किन टू स्किन कॉन्टैक्ट) से जो संबंध में गहराई स्थापित होती है उसका विशेष महत्व है। इससे नवजात शिशु को भावनात्मक सुरक्षा भी मिलती है और माँ के शरीर में दूध का उत्पादन भी बढ़ता है। परिवार का बदलता स्वरूप भी एक चुनौती है। पहले संयुक्त परिवारों में नई माताओं को दादी-नानी और अन्य अनुभवी महिलाओं का मार्गदर्शन मिल जाता था। आज अधिकांश परिवार एकल हो गए हैं, जिसके कारण युवा माताएँ स्तनपान संबंधी समस्याओं से जूझ रही है। जैसे दूध कम बनना, बच्चे का सही तरीके से दूध न पीना, स्तनों में दर्द या सूजन, दूध पिलाने के लिए मानसिक रूप से तैयार न हो पाना आदि का समाधान समय पर नहीं कर पातीं और गूगल पर हर समस्या का उत्तर खोज रही है। गूगल ज्ञान की तुलना अनुभवी माता से नहीं की जा सकती है। इसका नतीजा ये होता है कि वह छह महीने तक केवल अपना दूध न पिला कर के वैकल्पिक आहार की ओर बढ़ जाती हैं। मानसिक स्वास्थ्य भी एक महत्वपूर्ण पहलू है। प्रसव के बाद तनाव, चिंता और प्रसवोत्तर अवसाद कई माताओं को प्रभावित करते हैं। पर्याप्त नींद न मिलना, घरेलू और सामाजिक अपेक्षाओं का दबाव, स्वयं के स्वास्थ्य की उपेक्षा, शारीरिक बदलावों को न संभाल पाना आदि स्तनपान की प्रक्रिया को कठिन बना सकते हैं। ऐसे समय में पति और परिवार का भावनात्मक सहयोग, माँ और बच्चे के लिए विशेष स्थान, उपयुक्त समय, आराम और स्वास्थ्य विशेषज्ञों जैसे स्तनपान विशेषज्ञ, स्त्री रोग विशेषज्ञ, आहार पोषण विशेषज्ञ आदि का मार्गदर्शन अत्यंत आवश्यक हो जाता है।
इसके अतिरिक्त, सार्वजनिक स्थानों पर स्तनपान को लेकर समाज में अभी भी झिझक और असहजता देखी जाती है। कई माताएँ बाहर जाने पर बच्चे को स्तनपान कराने में संकोच महसूस करती हैं। यह सामाजिक दृष्टिकोण भी स्तनपान को प्रभावित करता है। आवश्यकता इस बात की है कि स्तनपान को एक स्वाभाविक और सम्मानजनक प्रक्रिया के रूप में स्वीकार किया जाए। हर सार्वजनिक स्थान पर सुविधाजनक फीडिंग कॉर्नर्स बनाए जाय ताकि माताएं निसंकोच अपने बालकों को स्तनपान करा सके। इन चुनौतियों के समाधान के लिए व्यापक जनजागरूकता आवश्यक है। गर्भावस्था के दौरान ही स्तनपान संबंधी परामर्श दिया जाना चाहिए। कार्यस्थलों पर मातृत्व-अनुकूल नीतियाँ लागू की जानी चाहिए तथा परिवार के सदस्यों को भी इस विषय में संवेदनशील बनाया जाना चाहिए। स्वास्थ्यकर्मी, पोषण विशेषज्ञ और सामाजिक संगठन मिलकर युवा माता-पिता को सही जानकारी और सहयोग प्रदान कर सकते हैं।
यूनिसेफ के शोध आधारित आंकड़ों के अनुसार, पहले छह माह तक केवल स्तनपान कराने से डायरिया, निमोनिया, कुपोषण तथा शिशु मृत्यु के जोखिम में उल्लेखनीय कमी आती है। स्तनपान शिशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ माँ के स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है। स्तनपान केवल शिशु के पोषण का माध्यम नहीं है, बल्कि माँ और बच्चे के बीच भावनात्मक संबंध को भी मजबूत करता है। युवा पीढ़ी के सामने मौजूद चुनौतियों को समझकर यदि समाज, परिवार और संस्थाएँ मिलकर सहयोग करें, तो प्रत्येक बच्चे को जीवन की सर्वोत्तम शुरुआत मिल सकती है। स्वस्थ शिशु, स्वस्थ माँ और स्वस्थ समाज की नींव स्तनपान से ही मजबूत होती है। मध्यप्रदेश लंबे समय से देश के उन राज्यों में शामिल रहा है जहाँ शिशु एवं नवजात मृत्यु दर राष्ट्रीय औसत से अधिक रही है। यूनिसेफ ने भी राज्य में नवजात मृत्यु को एक प्रमुख चुनौती माना है। माँ और बच्चे के लिए यूनिसेफ और भारत सरकार द्वारा प्रमुख प्रयास किये गए हैं। 1. माँ अभियान (मदर एब्सोल्यूट अफेक्शन)के माध्यम से स्तनपान को बढ़ावा मिला है।
2. लक्ष्य कार्यक्रम के तहत प्रसव कक्षों में नवजात को जन्म के पहले घंटे में स्तनपान सुनिश्चित करने पर बल मिला है।
3. बेबी प्रेंडली हॉस्पिटल इनिशिएटिव के माध्यम से अस्पतालों में स्तनपान समर्थक वातावरण का निर्माण किया गया है।
4. पोषण अभियान के अंतर्गत गर्भवती एवं धात्री माताओं को पोषण एवं स्तनपान संबंधी परामर्श दिया जाता है। 5. आई सी डी एस द्वारा सामुदायिक जागरूकता कार्यक्रम के तहत आशा एवं आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण तथा प्रारंभिक स्तनपान एवं एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग के लिए व्यवहार परिवर्तन संचार टूल किट का निर्माण और प्रयोग किए गए है।
आवश्यकता है इसे शिशु के जन्म के बाद माँ के पहले गाढ़े पीले दूध को शिशु का पहला टीका मान लेने की और अपनी युवा धात्री महिलाओं को स्तनपान के लिए जागरूक बनाने की।
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 2 अगस्त 2026 के अंक में पृष्ठ 8 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें






