शुक्रवार को राजपुरा के पास अमृतसर से बिहार जा रही कर्मभूमि एक्सप्रेस के चार डिब्बों में आग लग गई। गनीमत बस यही रही कि समय रहते ट्रेन को रोक लिया गया और यात्री किसी तरह ट्रेन से उतरकर खुद को बचा सके। जब भी रेल महकमे में प्रबंधन और सेवाओं के स्तर पर सुधार का सवाल आता है, तब सरकारी दावे कमोबेश इसी तरह के होते हैं कि अब यहां के आम लोगों को ट्रेन में सफर करते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाओं का अनुभव होगा। मगर यात्रा के दौरान ट्रेनों से लेकर प्लेटफार्मों तक पर होने वाले हादसे यही बताते हैं कि सरकार के दावों के बरक्स साधारण लोगों को रेलगाड़ी से सफर के दौरान न केवल बहुस्तरीय मुश्किलों और बाधाओं का सामना करना पड़ता है, बल्कि कई बार जानलेवा जोखिम से भी गुजरना पड़ता है। पंजाब में पटियाला के पास राजपुरा में एक ट्रेन में आग लगने की घटना से एक बार फिर ट्रेन यात्रा को लेकर सवाल खड़ा हुआ है कि यात्री आखिर अपने गंतव्य तक सुरक्षित पहुंचने के किस भरोसे पर रेल यात्रा करे। गौरतलब है कि शुशुक्रवार को राजपुरा के पास अमृतसर से बिहार जा रही कर्मभूमि एक्सप्रेस के चार डिब्बों में आग लग गई। गनीमत बस यही रही कि समय रहते ट्रेन को रोक लिया गया और यात्री किसी तरह ट्रेन से उतरकर खुद को बचा सके। सवाल है कि एक चलती ट्रेन में आग लगने के बाद यात्रियों के हताहत न होने को क्या सिर्फ इस आधार पर सुरक्षा इंतजामों का एक आदर्श उदाहरण माना जा सकता है कि रेलवे के सुरक्षा तंत्र ने समय रहते खतरे का संकेत दे दिया? जिस तरह यात्रियों से भरी ट्रेन के चार डिब्बों में आग लग गई, ऐसे में इस हादसे का असर क्या हो सकता था, इसकी बस कल्पना ही की जा सकती है। अब एक औपचारिकता और रस्म की तरह आग लगने के कारणों की जांच की घोषणा हुई है, लेकिन उसके नतीजे क्या आएंगे, उसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाएगा, क्या कार्रवाई होगी, इसका पता आम लोगों को शायद ही कभी लग पाए। इसके समांतर भारतीय ट्रेनों को अंतरराष्ट्रीय सुविधाओं से लैस करने के लिए आए दिन कार्यक्रमों की घोषणाएं होती रहती हैं। एक ओर बुलेट ट्रेन परियोजना का हवाला देकर रेलवे को नई ऊंचाई देने के दावे अक्सर दोहराए जाते रहते हैं, दूसरी ओर ट्रेनों के पटरी से उतरने, आपस में टक्कर से लेकर आग लगने की घटनाएं होती रहती हैं। कभी धुंध या कोहरे, तो कभी किसी अन्य कारण से ट्रेनों का अपने गंतव्य तक कई-कई घंटे की देरी से पहुंचना और निर्धारित ट्रेनों का रद्द होना एक आम व्यवस्था की तरह हो गई है। एक अनुमान के मुताबिक, रेल महकमे में अब भी करीब ढाई लाख पद खाली पड़े हैं। खुद रेलवे ने सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत यह जानकारी दी थी कि अकेले सुरक्षा श्रेणी में डेढ़ लाख से अधिक स्वीकृत पद रिक्त हैं। इस स्थिति में हादसों से लेकर सेवा में कमी और अन्य स्तर पर मौजूद खामियों की वजहें समझी जा सकती हैं। रेलवे की खानपान सेवा में जिस तरह खराब खाना परोसने की शिकायतें अक्सर आती रहती हैं, वह यात्रियों के साथ बेईमानी से कम नहीं है। कोई दुर्घटना होने या अनियमितता के खुलासे और उसके तूल पकड़ने के बाद केवल जांच और कार्रवाई का भरोसा देने की खबरों से व्यवस्था में सुधार संभव नहीं है। इसके लिए रेलवे को ईमानदार इच्छाशक्ति के साथ काम करना होगा। अव्यवस्था से लेकर हादसों की निरंतरता को देखते हुए क्या सरकार कभी इस बात की जरूरत महसूस करती है कि एक आम यात्री उसकी ओर से सुरक्षित यात्रा के भरोसे ही अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए रेल से सफर का चुनाव करता है?
यह खबर सिटी ब्लास्ट अख़बार के 8 November 2026 के अंक में पृष्ठ 8 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें



