‘चलो चले 2016 की ओर’……यह सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि उस व्यापारी की बेचैनी का संकेत है जो आज की लगातार बदलती भुगतान व्यवस्था और बढ़ते आर्थिक दबाव के बीच अपने पुराने, सरल कारोबारी ढांचे को याद कर रहा है।
यहां 2016 से आशय नोटबंदी से पहले के उस दौर से है, जब व्यापार में नकद लेन-देन की भूमिका बहुत बड़ी थी और डिजिटल भुगतान आज की तरह सर्वव्यापी नहीं था। व्यापारी तब भी व्यापार करता था, ग्राहक तब भी खरीदारी करता था और बाजार तब भी चलता था। इसलिए सवाल यह नहीं है कि व्यापारी तकनीक के खिलाफ है। सवाल यह है कि क्या तकनीक अपनाने की कीमत भी सिर्फ व्यापारी ही
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 8 अक्टूबर 2026 के अंक में पृष्ठ 10 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें


