सोमवार, 12 अक्टूबर 2026
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दुकान पर मंदी, ऑनाइन बाजार की तेजी आखिर व्यापारी कब तक सहेगा?

भारत का बाजार तेजी से बद रहा है। मोबाइ पर सामान देखना, घर बैठे खरीदारी करना और कुछ ही समय में सामान घर पहुंच जाना अब आम बात हो गई…

भारत का बाजार तेजी से बद रहा है। मोबाइ पर सामान देखना, घर बैठे खरीदारी करना और कुछ ही समय में सामान घर पहुंच जाना अब आम बात हो गई है। ऑनाइन कारोबार ने ग्राहकों के िए सुविधा बढ़ाई है, ेकिन इसका असर परंपरागत छोटे और मझे दुकानदारों पर साफ दिखाई देने गा है।

आज देश का फुटकर व्यापारी गहरी मंदी से जूझ रहा है। दुकान का किराया, बिजी का बि, कर्मचारियों की तनख्वाह, मा की ागत और दूसरे खर्च गातार बने हुए हैं, ेकिन ग्राहक पहे की तरह दुकान पर नहीं आ रहा। कई दुकानदारों के सामने सबसे बड़ा सवा यही है कि दुकान का खर्च कैसे निके और परिवार कैसे चे? ऑनाइन कारोबार से मुकाबा करना छोटे दुकानदार के िए आसान नहीं है। बड़ी ऑनाइन कंपनियां बड़े स्तर पर कारोबार करती हैं। वे तरह-तरह की छूट देती हैं और सामान घर तक पहुंचाती हैं। इसके सामने मोहले और बाजार की छोटी दुकान खड़ी है, जहां दुकानदार अपनी पूरी पूंजी गाकर मा रखता है और ग्राहक का इंतजार करता है।

यहां सवा ऑनाइन कारोबार को बंद करने का नहीं है। समय के साथ व्यापार का तरीका बदना जरूरी है। ेकिन सवा यह जरूर है कि क्या छोटे दुकानदार को भी बदते बाजार में आगे बढ़ने का मौका दिया जा रहा है? सरकार व्यापारियों को डिजिट कारोबार से जोड़ने की बात करती है यह अच्छी पह है, ेकिन केव ऑनाइन पेटफॉर्म से जोड़ देना ही समाधान नहीं है। छोटे व्यापारी को आसान कर्ज, कम खर्च में डिजिट सुविधा, ऑनाइन बिक्री की जानकारी और बड़ी कंपनियों के साथ बराबरी का मौका भी मिना चाहिए। देश में छोटे और मझे दुकानदारों की संख्या बहुत बड़ी है। यही व्यापारी बाजार को रोज चाता है। सुबह दुकान खोने से ेकर रात दुकान बंद करने तक वह मेहनत करता है। वह सिर्फ अपना परिवार नहीं पाता, बल्कि कर्मचारी, मा सपयर और कई दूसरे ोगों के रोजगार से भी जुड़ा होता है। सबसे बड़ी बात यह है कि व्यापारी अपनी परेशानी को ेकर अक्सर सड़क पर आंदोन नहीं करता। किसान अपनी मांग के िए आंदोन करता है, छात्र अपनी समस्या को ेकर आवाज उठाते हैं कर्मचारी अपने अधिकारों के िए संघर्ष करते हैं, ेकिन व्यापारी अक्सर नुकसान सहकर भी चुपचाप अपनी दुकान खोता है और अगे दिन फिर कारोबार शुरू कर देता है।

क्या उसकी चुप्पी को उसकी मजबूरी समझ यिा गया है? —

ोकसभा में 543 सांसद हैं। चुनाव के समय व्यापारी वर्ग हर क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। व्यापारियों का परिवार, उनका सामाजिक संपर्क और उनका बाजार से जुड़ा नेटवर्क चुनाव में भी बड़ी भूमिका निभाता है। ेकिन चुनाव के बाद यही व्यापारी जब मंदी, महंगाई और ऑनाइन कारोबार की मार से परेशान होता है तो उसकी आवाज उतनी मजबूती से क्यों नहीं सुनी जाती?

व्यापारी सरकार को टैक्स देता है। बाजार को चाता है, रोजगार देता है, देश की अर्थव्यवस्था में अपना योगदान देता है। फिर जब उसका कारोबार कमजोर पड़ रहा है तो उसकी चिंता भी उतनी ही जरूरी होनी चाहिए। सरकार को छोटे और मझे व्यापारियों के िए अग से मजबूत योजना बनानी चाहिए। उन्हें आसान ब्याज पर पैसा मिे। कारोबार के नियम आसान हों। डिजिट व्यापार में उन्हें भी जगह मिे। ऑनाइन और दुकान वो व्यापार के बीच स्वस्थ मुकाबा हो। स्थानीय बाजारों को बेहतर बनाया जाए और ग्राहकों को बाजार तक ाने के िए सुविधाएं बढ़ाई जाएं। क्योंकि एक दुकान बंद होना केव एक दुकानदार का नुकसान नहीं है। उसके साथ एक परिवार की आमदनी, कर्मचारियों की नौकरी और कई दूसरे ोगों का काम भी प्रभावित होता है। भारत डिजिट जरूर बने, ऑनाइन कारोबार भी बढ़े, ेकिन इसके साथ देश की पारंपरिक दुकानें भी बचनी चाहिए। आखिर यही छोटी दुकानें वर्षों से भारत के बाजार की पहचान रही हैं। व्यापारी को भीख नहीं चाहिए। उसे बराबरी का मौका चाहिए। वह सरकार से केव इतना पूछ रहा है ‘हमने हर मुश्कि समय में देश की अर्थव्यवस्था का साथ दिया। अब जब हम मुश्कि में हैं, तो सरकार हमारा साथ कब देगी?’ मंदी की मार झे रहा व्यापारी आखिर कब तक चुपचाप सहता रहेगा? वह सरकार से केव इतना पूछ रहा है ‘हमने हर मुश्कि समय में देश की अर्थव्यवस्था का साथ दिया। अब जब हम मुश्कि में हैं, तो सरकार हमारा साथ कब देगी?’ मंदी की मार झे रहा व्यापारी आखिर कब तक चुपचाप सहता रहेगा?

यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 21 अगस्त 2026 के अंक में पृष्ठ 10 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें