तंकी हिंसा ने उसकी आंतरिक सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिरता के लिए चुनौती पैदा कर दी है। आतंकियों को पाल-पोस कर उन्हें पड़ोसी देशों के खिलाफ औजार की तरह इस्तेमाल करने वाले पाकिस्तान के लिए भी अब यह हथियार सबसे बड़ा खतरा बनता जा रहा है। आतंकी हिंसा ने उसकी आंतरिक सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिरता के लिए चुनौती पैदा कर दी है। इसी क्रम में बीते शुक्रवार को पाकिस्तान के कोहाट जिले में जुमे की नमाज के दौरान आतंकियों ने पहले एक मस्जिद के पास विस्फोटक से लदे वाहन में धमाका किया और फिर पास के पुलिस ठिकानों पर हमला किया, जिसमें कम से कम इक्कीस लोगों की मौत हो गई और सौ से अधिक घायल हो गए। मृतकों में ज्यादातर पुलिसकर्मी थे। सवाल है कि आतंकी संगठनों को खड़ा करने और वित्तपोषण के जरिए उनकी जड़ों को मजबूत करने में जुटे पाकिस्तान को क्या इसका जरा भी आभास नहीं था कि एक दिन यही आतंकवाद पलट कर उसे भी निशाना बना सकता है? वहां के सत्ताधारियों ने राजनीतिक लाभ के लिए जिन छद्म नीतियों का सहारा लिया, उसका खमियाजा अब अवाम को भी भुगतना पड़ रहा है। इस बात पर गौर करना भी जरूरी है कि पाकिस्तान में आतंकी हिंसा की यह स्थिति अचानक पैदा नहीं हुई है। उसकी नीतियों में आतंकी संगठनों के बीच भेद करने की प्रवृत्ति वर्षों से दिखाई देती रही है। ऐसे आरोप लगते रहे हैं कि जिन आतंकी संगठनों को पाकिस्तान ने भारत या अफगानिस्तान के खिलाफ खड़ा किया, उन्हें आतंकवाद की परिभाषा से बाहर रखा गया, जबकि जिन्होंने सत्ता की नीतियों के तय ढांचे के विपरीत नए आतंकी संगठन बना लिए, उन्हें देश की सुरक्षा के लिए खतरा करार दिया गया। खबरों के मुताबिक, कोहाट में मस्जिद के पास हमले की जिम्मेदारी जिस आतंकी संगठन ने ली है, उसका गठन पिछले साल अप्रैल में ही हुआ था। इससे स्पष्ट है कि वहां नए- नए आतंकी समूहों के पनपने का सिलसिला लगातार जारी है। पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी खुद को आतंकवाद से पीड़ित बताता रहा है, लेकिन उसे यह सच भी स्वीकार करना होगा कि जब तक वह अपनी सहूलियत के हिसाब से आतंकवाद को ‘अच्छा’ और ‘बुरा’ मानता रहेगा, तब तक इस संकट का समाधान संभव नहीं है। कुछ समय की नरमी के बाद अमेरिका ने एक बार फिर से आर्थिक मोर्चे पर अपनी मनमानी का रुख अख्तियार कर लिया लगता है। हालांकि यह समझना मुश्किल है कि मौजूदा भू-राजनीतिक दौर में जब दुनिया बहुध्रुवीय हो रही है, अमेरिका आखिर क्यों यह चाहता है कि कोई देश उसके प्रभाव में खुद को समेट कर रखे और दूसरी ओर न देखे, भले ही इस क्रम में उसे अमेरिका पर पूरी तरह निर्भर होना पड़े।
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 21 सितम्बर 2026 के अंक में पृष्ठ 9 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें



