दुरुपयोग का प्रयास सामने आया है, उससे एक बार फिर एसआइआर प्रक्रिया की शुचिता कठघरे में खड़ी हुई है। समूचा मामला दरअसल निर्वाचन आयोग की साख पर सवाल उठाता है, जिसकी लापरवाही की वजह से न जाने कितने लोग मतदाता सूची से बाहर हुए और उन्हें मतदान के अधिकार से वंचित होना पड़ा। इससे किसी को भी असहमति नहीं होगी कि देश की चुनाव प्रक्रिया में सिर्फ वैध मतदाता को ही मतदान करने का अधिकार मिले। साथ ही संबंधित क्षेत्र की मतदाता सूची में वैसे लोगों के नाम हटा दिए जाएं, जिनकी या तो मौत हो गई या फिर वे वहां से स्थायी रूप से विस्थापित हो गए। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआइआर का उद्देश्य यही बताया गया है कि इस अभियान के जरिए वैध और पात्र मतदाताओं के वोट देने का हक सुनिश्चित किया जाएगा। सवाल है कि इस अभियान के दौरान अगर गलत तरीके से मतदाताओं के नाम सूची से हटाने की कोशिश भी हो रही है, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? झारखंड के गोड्डा जिले में जिस तरह कई लोगों के नाम मतदाता सूची से हटवाने के लिए परिपत्र-7 के दुरुपयोग का प्रयास सामने आया है, उससे एक बार फिर एसआइआर प्रक्रिया की शुचिता कठघरे में खड़ी हुई है। इससे पहले भी अलग-अलग कारणों से एसआइआर के जरिए बेलगाम तरीके से मतदाताओं के नाम सूची से हटाने के आरोप लगते रहे हैं। यह अपने आप में विचित्र है कि निर्वाचन आयोग अपने जिस अभियान को केवल वैध मतदाताओं के मतदान का हक सुनिश्चित करने का जरिया बता रहा है, उसी में ऐसे अनेक उदाहरण सामने आ रहे हैं, जिनमें गलत तरीके से सूची से नाम हटाए जाने के आरोप लगे हैं। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों के पहले जो एसआइआर की प्रक्रिया संचालित की गई थी, उसमें लाखों लोग मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए। जब विपक्षी दलों ने इसके खिलाफ आवाज उठाई और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो उसके बाद अपीलीय न्यायाधिकरणों के जरिए इसका समाधान निकालने की कोशिश की गई। अब अपील और उसके बाद जैसी तस्वीर उभर रही है, उसने एक तरह से निर्वाचन आयोग के कामकाज पर गंभीर सवाल उठाए हैं। दरअसल, हाल ही में आई खबर के मुताबिक, शुरुआती दौर में ही न्यायाधिकरणों में सूची से हटाए जाने के जितने मामले पहुंचे, उनमें से 91 फीसद लोगों के मताधिकार को वैध पाया गया और उनका नाम फिर से मतदाता सूची में शामिल किया गया। इस बीच राज्य में विधानसभा चुनाव हुए और सूची में दोबारा शामिल होने के बावजूद ऐसे लोग वोट नहीं दे सके। सवाल है कि इस सबकी जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा? झारखंड और पश्चिम बंगाल में भाजपा के कार्यकर्ताओं पर वैसे मतदाताओं के भी नाम हटवाने के लिए सुनियोजित तरीके से परिपत्र-7 का बेजा इस्तेमाल करने के आरोप सामने आए, जो अपने पते पर मौजूद थे। झारखंड के गोड्डा में बूथ स्तरीय अधिकारी यानी बीएलओ ने कुछ लोगों की ओर से दिए गए परिपत्र-7 पर सवाल उठाए और कहा कि जिनका नाम हटाने के लिए ‘पते पर मौजूद नहीं’ या ‘स्थानांतरित’ की श्रेणी के तहत यह आवेदन दिया जा रहा है, वे लोग लंबे समय से अपने पते पर रह रहे हैं और वैध मतदाता हैं। अब इस बात की क्या गारंटी है कि समूची एसआइआर की प्रक्रिया में अलग- अलग राज्यों में ऐसा बड़े पैमाने पर नहीं किया गया होगा। क्या यही वजह नहीं है कि पश्चिम बंगाल में अपीलीय न्यायाधिकरणों में तकरीबन 91 फीसद लोगों के नाम को फिर से मतदाता सूची में शामिल करना पड़ा? यह समूचा मामला दरअसल निर्वाचन आयोग की साख पर सवाल उठाता है, जिसकी लापरवाही की वजह से न जाने कितने लोग मतदाता सूची से बाहर हुए और उन्हें मतदान के अधिकार से वंचित होना पड़ा।
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 4 सितम्बर 2026 के अंक में पृष्ठ 8 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें




