सोमवार, 12 अक्टूबर 2026
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संपादकीय मतदाता सूची से 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटे, आयोग में मतभेद से सवाल गहरे

ह पहली बार नहीं है, जब चुनाव आयोग के भीतर असहमति सार्वजनिक हुई है। इससे पहले वर्ष 2019 में तत्कालीन चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा…

ह पहली बार नहीं है, जब चुनाव आयोग के भीतर असहमति सार्वजनिक हुई है। इससे पहले वर्ष

2019 में तत्कालीन चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा से अलग विचार व्यक्त कर आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन से जुड़े आदेशों में असहमति या अल्पमत की राय भी दर्ज करने की मांग की थी। देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव आयोग की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यह एक संवैधानिक और स्वायत्त संस्था है। इसकी जिम्मेदारी मतदाता सूची के शुद्धिकरण एवं अद्यतन से लेकर निष्पक्ष और स्वतंत्र रूप से चुनाव कराने की होती है। ऐसे में यदि आयोग के भीतर ही मतभेद पैदा हो जाएं और उनकी चर्चा मतदाता सूची तथा चुनाव प्रक्रिया जैसे मूल विषयों तक पहुंचे, तो उसकी संस्थागत विश्वसनीयता और पारदर्शिता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। मुख्य चुनाव आयुक्त और दो आयुक्तों के बीच मतभेदों को लेकर बुधवार को जिस तरह की खबरें सामने आईं, उससे एक नया विवाद खड़ा हो गया है। विपक्ष ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए इसे लोकतंत्र पर प्रहार बताया है, जबकि सत्तारूढ़ भाजपा का तर्क है कि विचार-विमर्श के दौरान निर्वाचन आयुक्तों की ओर से अलग-अलग विचार व्यक्त करना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। मगर यहां सवाल वैचारिक मतभेदों का नहीं, बल्कि नियम-कानूनों से जुड़े प्रावधानों का है। अगर चुनाव आयोग के भीतर कोई प्रश्न उठता है, तो क्या उसके कानूनी पहलुओं पर बारीकी से गौर कर आम सहमति बनाना जरूरी नहीं है? खबरों में कहा गया है कि दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस माह में निर्वाचन आयोग के फैसलों पर चौदह बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। इनमें मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और प्रक्रियागत बदलावों को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए। आयोग में मतभेदों की ये खबरें ऐसे समय में आई हैं, जब विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। इसकी शुरुआत बिहार से हुई थी और पश्चिम बंगाल के बाद अब दिल्ली में भी लाखों मतदाताओं के मसविदा सूची से बाहर हो जाने पर चिंता जताई जा रही है। इसकी गंभीरता इस आंकड़े में दिखती है कि देश भर में अब तक पुनरीक्षण के तहत तेरह करोड़ से ज्यादा लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए दिए गए हैं। ऐसे में चुनाव आयोग में मतभेदों के दावे ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। हालांकि, आयोग के हवाले से कहा गया है कि दो चुनाव आयुक्तों ने मतदाता सूची के शुद्धिकरण के दौरान नाम हटाए जाने सहित कई मुद्दे उठाए थे, लेकिन एसआईआर से जुड़े सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं। यह पहली बार नहीं है, जब चुनाव आयोग के भीतर असहमति सार्वजनिक हुई है। इससे पहले वर्ष 2019 में तत्कालीन चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा से अलग विचार व्यक्त कर आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन से जुड़े आदेशों में असहमति या अल्पमत की राय भी दर्ज करने की मांग की थी। इससे पूर्व वर्ष 2009 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति को चुनाव आयुक्त नवीन चावला को पद से हटाने की सिफारिश भेजी थी। तब इस सिफारिश की वैधता, समय और औचित्य को लेकर सवाल उठे थे। चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली से जुड़ा महत्त्वपूर्ण प्रश्न उसकी संस्थागत स्वतंत्रता और निर्णय प्रक्रिया का है। जब आयोग के भीतर अलग-अलग मत सामने आते हैं, तो जरूरी है कि असहमति के कारणों और निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर पारदर्शिता बरती जाए, ताकि मतदाताओं में किसी तरह का भ्रम पैदा न हो। चुनाव आयोग की जिम्मेदारी सिर्फ मतदाता सूची का अद्यतन ही नहीं, बल्कि प्रत्येक पात्र नागरिक के मताधिकार की रक्षा करना भी है।

यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 24 सितम्बर 2026 के अंक में पृष्ठ 9 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें