नाव आयोग की SIR (विशेष गहन पुनरीक्षण) प्रक्रिया पर पारदर्शिता को लेकर सवाल उठ रहे हैं। तकनीकी व दस्तावेजी विसंगतियों के कारण करोड़ों पात्र नागरिकों के नाम मतदाता सूची से कटने का खतरा पैदा हो गया है। मतदाता सूची का शुद्धिकरण और अद्यतन किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए जरूरी है। मृतकों, स्थान बदल चुके लोगों, दोहरे पंजीकरण और अपात्र व्यक्तियों के नाम हटाना तथा योग्य नागरिकों को सूची में शामिल करना चुनाव प्रक्रिया की शुचिता और विश्वसनीयता के लिए महत्त्वपूर्ण है। देश में चुनाव आयोग ने इसी मकसद से विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआइआर प्रक्रिया शुरू की है, मगर इसमें निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर शुरू से ही सवाल उठते रहे हैं। बिहार से लेकर पश्चिम बंगाल और अब दिल्ली में बड़ी संख्या में लोगों का अंतिम तथा मसविदा सूची से बाहर होना सामाजिक, राजनीतिक और वैधानिक स्तर पर एक गंभीर एवं संवेदनशील मसला है। दिल्ली में मतदाता विवरण में विसंगतियों के कारण चुनाव आयोग की ओर से जिन लोगों को नोटिस भेजे गए हैं, उनमें पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, विदेश मंत्री एस जयशंकर समेत कई प्रमुख लोग शामिल हैं। ये विसंगतियां तकनीकी या रिकार्ड दर्ज करते वक्त हुईं त्रुटियों के कारण हो सकती हैं, लेकिन अहम सवाल यह है कि क्या ऐसी विसंगतियों के कारण किसी मतदाता को सूची से बाहर किया जा सकता है? भारत जैसे विशाल और विविधता से भरे देश में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं, जिनके पास पुराने दस्तावेज उपलब्ध नहीं होते। गरीब, प्रवासी मजदूर, बेघर लोग, बुजुर्ग, दूरदराज के इलाकों में रहने वाले नागरिक और ऐसे परिवार जिनके दस्तावेजों में नाम या जन्मतिथि में मामूली अंतर है, उनके लिए साक्ष्य जुटाना कठिन हो सकता है। ऐसी स्थिति में क्या तकनीकी या दस्तावेज की कमी को नागरिकों की लोकतांत्रिक भागीदारी में बाधा बनने दिया जाना चाहिए? चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से बाहर हुए 38 लाख से अधिक लोगों ने अपील दायर की है। इनमें से विशेष सुनवाई प्राधिकरणों ने पिछले सप्ताह तक एक लाख छब्बीस हजार से अधिक मामलों का निपटारा किया, जिनमें से एक लाख तेरह हजार से ज्यादा, यानी करीब नब्बे फीसद आवेदकों के नाम दोबारा मतदाता सूची में बहाल किए गए। ऐसे में यह सवाल महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि बहाली के इसी अनुपात में गणना के हिसाब से यदि सूची से बाहर किए गए सभी पात्र मतदाता मतदान में हिस्सा लेते, तो क्या विधानसभा के चुनाव नतीजे तब भी ऐसे ही होते! खबरों के मुताबिक, एसआइआर के पहले तीन चरणों में 31 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में तेरह करोड़ से ज्यादा लोग मतदाता सूची से बाहर हुए हैं। इनमें दिल्ली में सबसे ज्यादा 32 फीसद से ज्यादा नाम मसविदा सूची से हटाए गए हैं। यहां चुनाव आयोग की ओर से तैंतीस लाख से ज्यादा लोगों को विसंगतियों के कारण नोटिस जारी किए जा रहे हैं। इनमें अधिकांश मामले ऐसे हैं, जहां मतदाताओं का विवरण वर्ष 2002 के एसआइआर के रिकार्ड से मेल नहीं खाता है। जाहिर है, यह सिर्फ दस्तावेज में मामूली त्रुटि का मामला हो सकता है। ऐसे में अगर कोई व्यक्ति व्यावहारिक समस्याओं के कारण साक्ष्य प्रस्तुत न कर पाए, तो क्या उसे मताधिकार से वंचित किया जाना उचित होगा! लोकतंत्र में मतदान का अर्थ है राष्ट्र निर्माण में नागरिकों की सक्रिय भूमिका सुनिश्चित करना। इसलिए एसआइआर की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितने अपात्र नाम हटाए गए, बल्कि यह देखना ज्यादा जरूरी है कि कहीं कोई पात्र नागरिक लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित तो नहीं रह गया! महाराष्ट्र की समान नागरिक सहिंता समिति की दूसरी बैठक के दो दिन बाद बॉम्बे हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस आरसी चव्हाण ने पैनल से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने पब्लिक फीडबैक लेने के प्रोसेस को लेकर मतभेद और मीटिंग में एक ‘गैर-सदस्य’ की कथित मौजूदगी और भूमिका पर सवाल उठाए हैं।
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 22 सितम्बर 2026 के अंक में पृष्ठ 9 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें




