वसेना चुनाव चिह्न विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है और दलबदल को एक संवैधानिक पाप तक बता दिया है। एक लोकतांत्रिक प्रणाली में अगर कोई नेता या जनप्रतिनिधि अपनी पार्टी को छोड़ कर दूसरे दल में शामिल होता है, तो इसे उसके अधिकार के तौर पर देखा जाता है। मगर विडंबना है कि अब यह चलन इस स्तर तक पहुंच चुका है कि महज सत्ता का लाभ पाने के उद्देश्य से किसी राजनीतिक पार्टी के कुछ नेता बाकायदा समूह बना कर अपनी पार्टी छोड़ देते हैं और या तो खुद को असली पार्टी घोषित कर देते हैं या फिर किसी अन्य दल में शामिल हो जाते हैं। इसे भले ही एक सामान्य राजनीतिक चलन मान लिया गया हो, लेकिन सच यह है कि देश की राजनीति में बढ़ती इस प्रवृत्ति की वजह से नेताओं की निष्ठा और सिद्धांतों को लेकर उनकी प्रतिबद्धता पर तीखे सवाल उठने लगे हैं। गौरतलब है कि महाराष्ट्र में शिवसेना एक मजबूत राजनीतिक ताकत रही है। मगर जब एकनाथ शिंदे ने अपने साथ विधायकों को लेकर शिवसेना छोड़ने और भाजपा के साथ मिल कर सरकार बनाने का फैसला किया, उसके बाद यह पार्टी दो हिस्सों में बंट गई। उसके बाद चुनाव आयोग के सामने यह मामला सामने आया था कि मूल शिवसेना का चुनाव चिह्न किसे आबंटित किया जाए। इस क्रम में कई दौर की सुनवाई के बाद चुनाव आयोग ने उद्धव ठाकरे गुट की दलीलों को दरकिनार करके शिवसेना के शिंदे गुट को धनुष-बाण चुनाव चिह्न आबंटित कर दिया था। अब उसी मसले पर एक याचिका की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह सख्त टिप्पणी की है कि क्या उन लोगों को पार्टी का चुनाव चिह्न दिया जा सकता है, जिन्होंने दलबदल जैसा संवैधानिक पाप किया है। कोर्ट ने यह भी कहा कि क्या सिर्फ विधायकों की संख्या को अकेली कसौटी मानना उचित है, जबकि उनके खिलाफ अयोग्यता से संबंधित मामला अदालत में चल रहा हो। यह विचित्र है कि अगर संविधान में लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाने के उद्देश्य से कोई व्यवस्था की गई है, तो उसकी तकनीकी जटिलताओं का लाभ उठा कर कुछ नेता कई बार अपने पक्ष को लेकर ऐसा रवैया अख्तियार कर लेते हैं, जिसमें उन्हें जनप्रतिनिधि चुनने वाली जनता ठगी रह जाती है। ज्यादातर मौकों पर दलबदल की यह प्रवृत्ति न केवल प्रकारांतर से जनता के साथ धोखा होती है, बल्कि सैद्धांतिक राजनीति के बुनियादी तकाजों को ताक पर भी रखती है। इस प्रवृत्ति पर काबू पाने के लिए दलबदल कानून बना, लेकिन उससे इस पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ा। सवाल है कि चुने गए जनप्रतिनिधियों के बीच सुविधा की सियासत की बढ़ती प्रवृत्ति अगर इसी कदर आम होती गई, तो ऐसे में लोकतंत्र का कैसा स्वरूप बचेगा।
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 9 अक्टूबर 2026 के अंक में पृष्ठ 9 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें




