में कोई कामकाज ही नहीं होगा, तो फिर उसके मूल उद्देश्य की पूर्ति कैसे हो पाएगी। प्रवेश परीक्षाओं की प्रणाली में सुधार और जवाबदेही तय करने का मुद्दा अब सड़क से लेकर संसद तक पहुंच गया है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर युवाओं का विरोध प्रदर्शन जारी है और संसद के दोनों सदनों में विपक्ष इस मसले को जोर-शोर से उठा रहा है। संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। यह सच है कि देश का संविधान हर नागरिक को इजाजत देता है कि वह शासन-प्रशासन या किसी संस्था की नीतियों और निर्णयों को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से अपना असंतोष और मांग जाहिर कर सकता है। ऐसे में क्या वजह रही कि प्रदर्शन कर रहे युवाओं से संवाद के बजाय उनके खिलाफ बल प्रयोग करने को ही अंतिम विकल्प मान लिया गया! क्या यह सरकार की जिम्मेदारी नहीं है कि प्रदर्शनकारी युवाओं की मांग पर विचार किया जाए और समाधान का कोई रास्ता निकाला जाए? यही नहीं, संसद में इस मुद्दे पर बने गतिरोध से जो कीमती समय बर्बाद हो रहा है, उसके लिए कौन जिम्मेदार है? संसद का काम जनहित से जुड़े मसलों पर मंथन कर उन्हें निर्णायक रूप देने का होता है, मगर जब सदन में कोई कामकाज ही नहीं होगा, तो फिर उसके मूल उद्देश्य की पूर्ति कैसे हो पाएगी। दरअसल, नीट में गड़बड़ियों को लेकर काकरोच जनता पार्टी (काजपा) की ओर से जंतर-मंतर पर पिछले कई दिनों से विरोध प्रदर्शन किया जा रहा है। प्रदर्शनकारी केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और प्रवेश परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार की मांग कर रहे हैं। इस मामले ने बीते शनिवार को तब तूल पकड़ा, जब बीस दिनों से अनशन पर बैठे जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को पुलिस ने जबरन अस्पताल में भर्ती करा दिया। इसे युवाओं के आंदोलन की आवाज को दबाने के प्रयास के रूप में देखा गया। इसके बाद प्रदर्शनकारियों के संसद मार्च के दौरान सुरक्षा बलों के बल प्रयोग से स्थिति बिगड़ गई और कई जगह दोनों पक्षों के बीच हिंसक झड़पें हुईं। मगर अहम सवाल यह है कि यह नौबत आने ही क्यों दी गई? सरकार ने समय रहते प्रदर्शनकारी युवाओं से बातचीत कर उन्हें भरोसे में लेने की कोशिश क्यों नहीं की? जाहिर है, अगर सरकार की ओर से यह पहल की जाती, तो प्रदर्शनकारियों के संसद तक मार्च को टाला जा सकता था। प्रदर्शनकारी युवा अब भी जंतर-मंतर पर डटे हुए हैं और वे अपनी मांगों पर अडिग हैं। वहां ज्यादा भीड़ जमा न हो, इसके लिए बुधवार को सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए दिल्ली मेट्रो रेल निगम ने सत्रह स्टेशनों को बंद कर दिया। मगर इसका खमियाजा उन सैकड़ों यात्रियों को भी भुगतना पड़ा, जो अपने रोजमर्रा के कार्यों के लिए मेट्रो से सफर करते हैं।
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 23 जुलाई 2026 के अंक में पृष्ठ 9 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें


