और वैश्विक व्यवस्था में विकासशी देशों की भूमिका को मजबूत करने का एक महत्त्वपूर्ण अवसर है। ऐसे समय में जब दुनिया आर्थिक अनिश्चितता, युद्ध, व्यापारिक तनाव और बदते भू-राजनीतिक समीकरणों के दौर से गुजर रही है, तब ब्रिक्स की प्रासंगिकता और बढ़ गई है। भारत के िए यह मंच अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने के साथ-साथ वैश्विक दक्षिण की आवाज को सशक्त रूप देने की दृष्टि से भी अहम है। सम्मेन से पहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति वदिमीर पुतिन के बीच शुक्रवार को हुई बैठक में भी भारत की प्राथमिकताओं और प्रतिबद्धताओं को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया। इस दौरान मुख्य रूप से वर्ष 2030 तक वार्षिक द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाकर सौ अरब डार तक पहुंचाने तथा रक्षा, ऊर्जा और र्दुभ खनिजों के क्षेत्र में सहयोग को और मजबूत करने पर जोर दिया गया। यह इसिए भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में भारत को व्यापारिक सहयोग के मोर्चे पर अंतरराष्ट्रीय संबंधों को विस्तार देने और नए बाजार ताशने की जरूरत है। ब्राजी, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अप्रीका से शुरू हुए ब्रिक्स समूह का विस्तार अब कई अन्य देशों तक हो चुका है। ब्रिक्स भारत के िए केव आर्थिक एवं व्यापारिक सहयोग का मंच नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुन की दृष्टि से विकासशी देशों की आवाज बुंद करने का माध्यम भी है। भारत की नीति दुनिया की आर्थिक व्यवस्था को अधिक न्यायपूर्ण और संतुति बनाने की रही है, जिसके तहत अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में विकासशी देशों को उनकी आर्थिक क्षमता और जनसंख्या के अनुरूप अधिक प्रतिनिधित्व मिने की वकात की जाती रही है। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने, भुगतान प्रणायिों को मजबूत करने और आर्थिक सहयोग को आसान बनाने जैसे विषय भी भारत के िए महत्त्वपूर्ण हैं और इन मुद्दों पर शिखर सम्मेन में भी प्रमुखता से चर्चा होने की उम्मीद है। इसके आवा, भारत हमेशा से वैश्विक शांति का पक्षधर रहा है और प्रधानमंत्री मोदी ने पुतिन के साथ बैठक में दोहराया कि किसी भी समस्या का समाधान केव युद्ध नहीं हो सकता है। साथ ही कहा कि रूस- यूक्रेन संघर्ष को खत्म करने के शांति प्रयासों में भारत हर संभव मदद के िए तैयार है। भारत ऐसे समय में ब्रिक्स को अधिक प्रभावी मंच के रूप में आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, जब वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक परिस्थितियां गातार बद रही हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में संघर्ष, खासकर होर्मुज जमार्ग की नाकेबंदी तथा अमेरिका की व्यापार शुल्क नीतियों की वजह से विश्व की अर्थव्यवस्था प्रतिकू प्रभावों का सामना कर रही है। ऐसी स्थिति में भारत के िए चुनौती ब्रिक्स सम्मेन में संघर्ष से जुड़े मसे पर एकराय बनाने की भी है, क्योंकि समूह में शामि ईरान स्पष्ट रूप से अमेरिका और इजराइ की सैन्य कार्रवाई की निंदा करने पर जोर दे रहा है, जबकि यूएई समुद्री मार्गों में किसी तरह की बाधाओं के खिाफ है।
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 12 सितम्बर 2026 के अंक में पृष्ठ 9 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें


