सोमवार, 12 अक्टूबर 2026
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संपादकीय राम मंदिर के चढ़ावे में चोरी से निर्माण के फैसलों तक, भरोसे की हर परत जांच के घेरे में दा

आरोप कि मंदिर निर्माण के कार्य में समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा ने मनमाने तरीके से निर्णय किए, कई गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या मंदिर में ऐसी व्यवस्था कायम…

आरोप कि मंदिर निर्माण के कार्य में समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा ने मनमाने तरीके से निर्णय किए, कई गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या मंदिर में ऐसी व्यवस्था कायम होगी, जो निष्पक्ष, पारदर्शी और जवाबदेह हो, ताकि भविष्य में आस्था के साथ किसी तरह का खिलवाड़ न हो! अयोध्या में राम मंदिर के चढ़ावे में चोरी के मामले ने निश्चित तौर पर लोगों की आस्था को ठेस पहुंचाने के साथ उनके भरोसे को कमजोर किया है। किसी के लिए भी यह सोचना आश्चर्यजनक है कि चढ़ावा चोरी में वही लोग शामिल थे, जिन पर उसका हिसाब रखने की जिम्मेदारी थी। हालांकि, माना जा रहा था कि इस मामले की एसआइटी जांच से सारा सच सामने आ जाएगा, लेकिन अब इस जांच पर ही सवाल उठने लगे हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि खबरों के मुताबिक जांच रिपोर्ट में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास के उन तात्कालिक प्रमुख पदाधिकारियों का कोई जिक्र नहीं है, जिन पर वित्तीय प्रबंधन का पूरा दारोमदार था। यही नहीं, अब आरोपों का दायरा चढ़ावा चोरी से आगे बढ़कर राम मंदिर निर्माण तक जा पहुंचा है। दान राशि में गड़बड़ियों को लेकर खुद सवालों के घेरे में रहे न्यास के पूर्व महासचिव चंपत राय का यह आरोप कि मंदिर निर्माण के कार्य में समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा ने मनमाने तरीके से निर्णय किए, कई गंभीर सवाल खड़े करता है। ऐसे में यह प्रश्न अब हर किसी के मन में उठने लगा है कि क्या राम मंदिर के कार्य और प्रबंधन में और भी ऐसी परतें हैं, जिनका खुलना अभी बाकी है! इसमें दोराय नहीं कि मंदिर में चढ़ावे के रूप में आने वाला हर एक रुपया लोगों की अटूट श्रद्धा का प्रतीक होता है। हैरत की बात है कि न्यास के पदाधिकारी शुरू में चढ़ावा चोरी के आरोपों को सिरे से नकारते रहे, मगर जब आंतरिक जांच में गंभीर गड़बड़ियां सामने आईं, तो उन्होंने इसकी जिम्मेदारी लेने से ही इनकार कर दिया और सरकार से जांच कराने को कहा। इसके बाद ही एसआइटी का गठन हुआ। यह समझना मुश्किल है कि चढ़ावे में हो रही चोरी की न्यास के पदाधिकारियों को भनक क्यों नहीं लग पाई? क्या व्यवस्था की निगरानी के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति ही की जा रही थी? यह भी विचित्र है कि करोड़ों लोगों की आस्था पर आघात करने वाले इस मामले के सामने आने के बाद न्यास के किसी भी पदाधिकारी ने अपनी नैतिक जिम्मेदारी लेने का साहस नहीं दिखाया। जिन पदाधिकारियों ने इस्तीफे दिए, उसे भी इस मामले से खुद को अलग करने के प्रयास के रूप में ही देखा गया। इस मामले में राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा का कहना था कि उनका काम केवल निर्माण कार्यों को देखना है। साथ ही उन्होंने इस मामले की गंभीरता को रेखांकित करते हुए कहा था कि दान पात्रों की निगरानी और चौकसी में कमी रही, जिस कारण कुछ लोगों को वित्तीय हेराफेरी करने का मौका मिल गया। मगर अब न्यास के पूर्व महासचिव चंपत राय ने नृपेंद्र मिश्रा की कार्यप्रणाली को ही कठघरे में खड़ा कर दिया है। उनका दावा है कि कई बार निर्माण कार्यों को लेकर समिति में सर्वसम्मति से फैसले हुए, लेकिन बाद में नृपेंद्र मिश्रा के कहने पर उसमें बदलाव किए गए। इन आरोपों से यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या राम मंदिर के निर्माण कार्य में भी अनियमितताएं हुई हैं? इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि राम मंदिर का प्रबंधन जहां आदर्श तरीके से होना चाहिए था, वहीं ईमानदारी की मर्यादाओं को ताक पर रख दिया गया। बहरहाल, अब देखना यह है कि क्या मंदिर में ऐसी व्यवस्था कायम होगी, जो निष्पक्ष, पारदर्शी और जवाबदेह हो, ताकि भविष्य में आस्था के साथ किसी तरह का खिलवाड़ न हो!

यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 23 अगस्त 2026 के अंक में पृष्ठ 9 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें