मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026
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संपादकीय लोकतंत्र या दमन? नीट आंदोलन पर पुलिस कार्रवाई ने खड़े किए बड़े सवाल नी

करना क्या ऐसी गतिविधि है, जिसके लिए विद्यार्थियों को बेरहमी से पीटा जाए या उनसे दुर्व्यवहार किया जाए? एक लोकतांत्रिक देश के नागरिक होने के नाते अगर लोग सरकार की…

करना क्या ऐसी गतिविधि है, जिसके लिए विद्यार्थियों को बेरहमी से पीटा जाए या उनसे दुर्व्यवहार किया जाए? एक लोकतांत्रिक देश के नागरिक होने के नाते अगर लोग सरकार की किसी कमजोरी पर सवाल उठाते हैं या अपने असंतोष को जाहिर करते हैं, तो क्या उन्हें चुप कराने के लिए पुलिस की बेलगाम सख्ती का सहारा लेने को उचित ठहराया जा सकता है? यह सवाल नीट 2026 में प्रश्नपत्र लीक होने के मुद्दे पर खड़े हुए आंदोलन में शामिल युवाओं के खिलाफ पुलिस के रवैये के सामने आने के बाद उठा है, जिसमें यह विचार करने की जरूरत तक नहीं समझी गई कि क्या प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग आखिरी विकल्प था। अव्वल तो आंदोलनकारियों से संवाद के तकाजे को तरजीह नहीं दी गई। उसके बाद दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन में शामिल होने वालों के खिलाफ पुलिस ने जैसी सख्ती दिखाई, छात्र-छात्राओं की पिटाई की गई, उससे सरकार की मंशा और लोकतंत्र के प्रति उसके दायित्वों पर गहरे सवाल उठे हैं। इसी मुद्दे पर और जंतर-मंतर पर हुए लाठीचार्ज के खिलाफ मुंबई में हुए एक प्रदर्शन के दौरान कुछ विद्यार्थियों को एक पुलिसकर्मी ने आपत्तिजनक और गैरकानूनी तरीके से धमकी दी कि घर चले जाओ, नहीं तो जेब में ‘पाउडर’ डाल देंगे और फिर जिंदगी भर परेशान रहोगे। सवाल है कि एक लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन में शामिल होने भर के लिए विद्यार्थियों या किसी भी व्यक्ति को पुलिस ऐसी धमकी देती है, तो उसे कैसे देखा जाएगा? क्या यह एक ऐसी हरकत नहीं है, जिसकी आखिरी चोट कानून के शासन पर ही पड़ेगी? खासतौर पर जब कानून की रक्षा का दायित्व निभाने वाला एक व्यक्ति ही बेहिचक गैरकानूनी धमकी दे रहा हो, तो इसके बाद किससे उम्मीद की जाएगी? संभव है कि कानून- व्यवस्था बनाए रखने के लिए चौकस रहना पुलिस की जिम्मेदारी के तहत जरूरी है, लेकिन अगर किसी पुलिसकर्मी की हरकत की वजह से ही कानून का शासन भंग होता हो, तो उसे कैसे देखा जाएगा? नीट प्रश्नपत्र लीक के मुद्दे पर जिम्मेदारी तय करने और केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग के साथ प्रदर्शन करना क्या ऐसी गतिविधि है, जिसके लिए विद्यार्थियों को बेरहमी से पीटा जाए या उनसे दुर्व्यवहार किया जाए? इसी तरह कुछ जगहों पर प्रदर्शनकारियों के हंगामे और पुलिसकर्मियों पर हमले को भी उचित नहीं ठहराया जा सकता। इस क्रम में एक गंभीर सवाल यह उठा है कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान विद्यार्थियों पर लाठी चलाने वालों में पुलिसकर्मियों के अलावा ऐसे लोग कौन थे, जिनके पुलिस होने की कोई पहचान नहीं थी। उनमें से कई साधारण लोगों की तरह थे, तो कई की वर्दी पर उनकी नामपट्टी नहीं थी। प्रदर्शनकारियों से इस तरह निपटने का आदेश पुलिस महकमे को आखिर किसने दिया था? इसमें कोई दोराय नहीं कि कानून- व्यवस्था बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है और इसी के तहत अक्सर पुलिस को कई बार सख्त रुख अख्तियार करना पड़ता है। मगर इस जिम्मेदारी में अनिवार्य रूप से यह भी शामिल है कि सरकार की कोई भी कार्रवाई या कवायद किसी भी स्थिति में ऐसी नहीं हो सकती, जिससे लोकतंत्र और संवैधानिक अधिकार कमजोर हों या उन्हें नुकसान पहुंचे। अगर सरकार अपने इस दायित्व का ध्यान नहीं रखती है, तो इसका मतलब यह है कि उसे नागरिकों के लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों की फिक्र नहीं है। मगर नीट प्रश्नपत्र लीक के मसले पर विरोध प्रदर्शन करने वालों के साथ पुलिस का जैसा बर्ताव सामने आया, वैसा रवैया दर्शाकर सरकार क्या संदेश देना चाहती है? जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी का विरोध प्रदर्शन अभी भी चल रहा है। एक दिन पहले ही सोनम वांगचुक ने अपनी भूख हड़ताल खत्म कर दी है। इस पर अब जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का बयान सामने आया है, जिसमें उन्होंने कहा कि युवाओं को अपनी कोई मांग पूरी करवाने का पूरा हक है।

यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 25 जुलाई 2026 के अंक में पृष्ठ 9 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें