दिए जाने की घटना सामने आई है। तमाम कड़े कानूनों और पुलिस गश्त के दावों के बावजूद दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था आज भी बदहाल नजर आती है। राष्ट्रीय राजधानी होने के नाते यह उम्मीद की जाती है, यहां अन्य शहरों के मुकाबले हर स्तर पर व्यवस्था बेहतर होगी। लेकिन, इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि खासकर महिलाओं के मामले में अब भी इसकी गिनती सबसे असंवेदनशील और असुरक्षित महानगरों में ही की जाती है। वर्षों पहले हुए निर्भया मामले के बाद कानून में सख्ती तो की गई लेकिन राजधानी में महिलाओं के खिलाफ अपराध का सिलसिला थम नहीं रहा है। यहां के कश्मीरी गेट इलाके में निजी बस के अंदर नाबालिग छात्रा से सामूहिक बलात्कार करके बाहर फेंक दिए जाने की घटना सामने आई है, जिसने सबको शर्मसार कर दिया है। इससे स्पष्ट है कि महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े सवाल आज भी जस के तस हैं। जाहिर है, यह सुरक्षा एजेंसियों की लापरवाही का ही नतीजा है, वरना और क्या वजह हो सकती है कि अपराधियों के भीतर कानून का कोई खौफ नजर नहीं आता है। गौरतलब है कि वर्ष 2012 में निर्भया मामले ने पूरे देश को झकझोर दिया था। तब महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सड़क से संसद तक गूंज सनाई दी थी। इसी के परिणामस्वरूप कानून में बलात्कार की परिभाषा को व्यापक किया गया और यौन अपराधों से जुड़े कई नए प्रावधान जोड़े गए। मगर राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों से पता चलता है कि दिल्ली में वर्ष 2013-2019 तक बलात्कार के मामलों में बढ़ोतरी हुई। हैरत की बात है कि बीते चार अगस्त को एक चालक और परिचालक निजी बस में नोएडा के परी चौक से लेकर दिल्ली के कश्मीरी गेट इलाके तक नाबालिग लड़की को रात में इधर से उधर घुमाते रहे और उससे सामूहिक बलात्कार किया, मगर कहीं भी गश्त कर रहे पुलिसकर्मियों की निगाह उन पर नहीं पड़ी। न तो इस बस को कहीं नाके पर रोका गया और न ही सीसीटीवी की निगरानी पर ध्यान दिया दिया। इस घटना से केंद्र से लेकर दिल्ली तक में एक ही पार्टी की सरकार और बहुस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 1 सितम्बर 2026 के अंक में पृष्ठ 9 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें



