इंदौर नगर निगम में जब बड़े लोग घोटाले में फंसने लगते हैं तो उस घोटाले को जांच में अटका दिया जाता है। जो घोटाले में बहुत छोटे कर्मचारी शामिल होते हैं उसमे सारा काम तेजी से हो जाता है। इसका उदाहरण हाल ही में सामने आया है। नगर निगम का नामांतरण घोटाला अभी भी जांच के नाम पर अटका हुआ है तो वेतन घोटाले में कल रात को ही अपराधिक प्रकरण दर्ज करवा दिया गया।
नगर निगम के सिस्टम की कमजोरी को उजागर करने वाला नामांतरण घोटाला जांच में उलझ गया है। पिछले डेढ़ महीने से इस घोटाले की जांच ही चल रही है। तीन अधिकारियों को जांच का काम सौंपा गया। इसके बाद भी यह जांच अभी तक पूरी नहीं हो सकी है। इस घोटाले में बड़े-बड़े लोगों के नाम सामने आ रहे हैं। यह कहा जा रहा है कि नगर निगम के अधिकारियों की मिली भगत के बगैर यह घोटाला नहीं हो सकता है। इन अधिकारियों की आईडी और पासवर्ड का उपयोग करते हुए ही निगम के कर्मचारियों के द्वारा इस घोटाले को अंजाम दिया गया। इस घोटाले के तहत 356 लोगों के मकान के मालिक का नाम नगर निगम के रिकॉर्ड में बदल दिया गया। जिन लोगों के मकान के मालिक का नाम बदल गया और नए फर्जी मालिक का नाम चढ़ा दिया गया उनमें से फर्जी मलिक
नगर निगम आयुक्त के द्वारा वेतन घोटाले की जांच के लिए एक कमेटी बनाई गई है। इस कमेटी के द्वारा जांच शुरू कर दी गई है। कल ही इस कमेटी की पहली बैठक आयोजित की गई थी। अब जब नगर निगम के द्वारा इस घोटाले में मुकदमा ही दर्ज करवा दिया गया है तो ऐसे में यह सोचा जाना चाहिए कि यह जांच कमेटी ने 51 मकान का सौदा भी कर दिया। लोगों को हैरानी में डाल देने वाला यह घोटाला अभी भी एक पहेली बना हुआ है। नगर निगम के अधिकारियों के द्वारा जांच के नाम पर इस पूरे मामले को लटका कर रख दिया गया है। अधिकारियों का कहना है कि अभी जांच के काम में कम एक सप्ताह का समय और लगेगा। इसके बाद में फिर जांच करने वाली टीम अपनी रिपोर्ट देगी। फिर इस रिपोर्ट पर नगर निगम के कमिश्नर के द्वारा फैसला लिया जाएगा। उसके बाद कहीं जाकर किसी दोषी पर कार्रवाई
अब क्या करेगी जांच कमेटी
कोई मतलब नहीं रह जाता है। करने का रास्ता खुल सकेगा। एक तरफ जहां यह घोटाला जांच के नाम पर अटका हुआ है तो वहीं दूसरी तरफ निगम में हुए वेतन घोटाले में तेज गति के साथ कार्रवाई करते हुए दो दोषी कर्मचारियों के खिलाफ कल रात को पुलिस थाने में मुकदमा दर्ज करवा दिया गया। इसमें सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि यह दोनों कर्मचारी नगर निगम में तो काम कर रहे थे लेकिन निगम के कर्मचारी नहीं थे। यह दोनों कर्मचारी आउटसोर्स के आधार पर नगर निगम की सेवा में लिए गए थे।
आखिर क्या करेगी। इस जांच कमेटी के द्वारा की जाने वाली जांच का क्या मतलब रहेगा। मुकदमा दर्ज कर दिए जाने के कारण अब पुलिस के द्वारा इस पूरे मामले की जांच की जाएगी तो पुलिस की जांच के सामने निगम के अधिकारियों की कमेटी की जांच का ऐसे में इन कर्मचारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने में न नगर निगम के अधिकारियों को कोई आपत्ति थी और नहीं किसी को कोई फर्क पड़ रहा था। ध्यान रहे कि वेतन घोटाले में पांच ऐसे कर्मचारी जो कि नगर निगम में कर्मचारी तो थे लेकिन नौकरी पर नहीं आ रहे थे और लगातार अनुपस्थित चल रहे थे ऐसे कर्मचारियों का वेतन उनके खाते में नहीं डालते हुए खाता बदलकर अपने से जुड़े लोगों के खाते में डाल दिया गया। इस तरह कर्मचारियों के वेतन को धोखाधड़ी पूर्वक निकाकर निगम की राशि का गबन किया गया। यह खे नगर निगम में पिछे 6 महीने से च रहा था। इस तरह नामांतरण घोटाले को जांच के नाम पर रोक कर वेतन घोटाले में नगर निगम के द्वारा मुकदमा दर्ज करवाकर अपने कर्तव्य को पूर्ण कर लिया गया है।
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 31 जुलाई 2026 के अंक में पृष्ठ 4 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें



