बांटने के बजाय विस्थापितों की सुरक्षा, शांति बहाली और सम्मानजनक घर वापसी सुनिश्चित करनी होगी। किसी राज्य में अगर लंबे समय से एक विशेष तरह की हिंसा लगातार व्यवस्था का मुंह चिढ़ाती रहे, तो सरकार की नीतियों और नैतिक प्रतिबद्धताओं पर सवाल उठना स्वाभाविक है। मणिपुर में जातीय संघर्ष शुरू होने के बाद से जो हालात बने हैं और उससे निपटने के लिए विभिन्न स्तरों पर जिस तरह की उदासीनता रही है, उससे राज्य के सामाजिक ताने-बाने एवं सम्मान से जीवन जीने की गरिमा को भी गहरी चोट पहुंची है। आए दिन हिंसक घटनाओं में निर्दोष लोगों की जान जाने के साथ ही आमजन का शासन-प्रशासन पर भरोसा भी कमजोर होता जा रहा है। इस सब के बीच सबसे अधिक परेशानी उन लोगों को झेलनी पड़ रही है, जिन्होंने अपना घर, जमीन एवं रोजगार खो दिया है और लंबे समय से राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं। विकट परिस्थितियों में अब तक कई लोगों की मौत हो चुकी है। सर्वोच्च न्यायालय ने बीते गुरुवार को इस पर कड़ी नाराजगी जताई और राज्य सरकार से राहत शिविरों में हुई मौत के मामलों की जांच तथा विस्थापित परिवारों की सुरक्षा के लिए बंदोबस्त का पूरा ब्योरा देने को कहा है। मणिपुर में जातीय संघर्ष मई, 2023 में शुरू हुआ था। तब से लेकर राज्य में हिंसक घटनाओं में ढाई सौ से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और हजारों विस्थापित हुए हैं। हालांकि, कुछ समय के लिए तनाव थोड़ा कम हुआ था, लेकिन यह स्थिति ज्यादा दिन तक कायम नहीं रह पाई। राज्य में हिंसा फिर से तेज हो गई है। पिछले सप्ताह तमेंगलोंग और लांगपी में उग्रवादियों की गोलीबारी में दो महिलाओं समेत चार लोगों की मौत हो गई थी। इसके दो दिन बाद उग्रवादियों ने लीसांगफाई में दो महिलाओं की हत्या कर दी। सवाल है कि आखिर सरकार की नीतियों में जातीय संघर्ष को खत्म कर हिंसा को रोकने की प्रतिबद्धता नजर क्यों नहीं आती है? सरकार को उसका काम सर्वोच्च अदालत को क्यों याद दिलाना पड़ रहा है! आठ जिलों के राहत शिविरों में छह सौ चालीस मौतें और उनमें पच्चीस लोगों की अप्राकृतिक तरीके से मौत के मामले से यह सवाल उठा है कि हिंसा और अराजकता से पीड़ित लोगों ने जब राहत शिविरों में शरण ली, तो वहां भी उनका जीवन सुरक्षित नहीं रहा। दरअसल, विस्थापित परिवारों के लिए राहत शिविरों की सबसे बड़ी चुनौती उनकी अस्थायी प्रकृति है। किसी आपदा के बाद कुछ समय के लिए बनाए गए शिविर लंबे समय तक रहने की जगह बन जाएं, तो यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वहां बुनियादी सुविधाओं और सुरक्षा का पर्याप्त इंतजाम किया जाए। सीमित जगह में बड़ी संख्या में लोगों का रहना, बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों के लिए जरूरत के हिसाब से व्यवस्था न होना जाहिर तौर पर गंभीर संकट पैदा करता है। विस्थापन का असर शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा पर भी पड़ता है। इसलिए राहत शिविरों में अस्थायी शिक्षा केंद्र, परामर्श सेवाएं, बच्चों के लिए सुरक्षित गतिविधियां और युवाओं के लिए रोजगार एवं कौशल प्रशिक्षण की व्यवस्था जरूरी है। सरकार को यह समझना होगा कि विस्थापित परिवारों के संकट का समाधान केवल राहत सामग्री बांटने से संभव नहीं होगा। सबसे पहले हिंसा पर प्रभावी नियंत्रण और लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। इसके बाद विस्थापितों की सुरक्षित और सम्मानजनक घर वापसी की परिस्थितियां तैयार करनी होंगी। साथ ही विभिन्न समुदायों के बीच संवाद, सौहार्द और विश्वास बहाली के उपायों पर भी जोर देना होगा। आईआईटी बॉम्बे के सेकंड ईयर के एक छात्र ने शुक्रवार को आत्महत्या कर लिया। घटना से कुछ ही घंटों पहले उसे एग्जाम हॉल में मोबाइल फोन इस्तेमाल करते हुए पाया गया था। 19 साल के छात्र की मौत के बाद कैंपस में 400 से ज्यादा छात्रों ने प्रदर्शन किया और चल रहे मिड-सेमेस्टर एग्जाम को पोस्टपोन कर दिया गया। डिपार्टमेंट ऑफ एनर्जी साइंस एंड इंजीनियरिंग का छात्र कथित तौर पर एग्जाम हॉल में मोबाइल फोन इस्तेमाल करते हुए पाया गया था।
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 19 सितम्बर 2026 के अंक में पृष्ठ 8 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें



