नव व्यवहार स्थिर नहीं होता। विभिन्न रिश्तों और परिस्थितियों में व्यक्ति का अलग-अलग व्यवहार उसकी बदलती जिम्मेदारियों, प्राथमिकताओं और दृष्टिकोण को दर्शाता है, न कि दोहरे चरित्र को। पढ़ें महिमा सामंत का लेख… मनुष्य को समझना शायद संसार के सबसे कठिन कार्यों में से एक है। हम किसी व्यक्ति से मिलते हैं, उसके कुछ व्यवहार देखते हैं और उसके बारे में एक राय बना लेते हैं। मगर समय के साथ जब उसी व्यक्ति को अलग-अलग रिश्तों और परिस्थितियों में देखते हैं, तो अक्सर आश्चर्य होता है। जो व्यक्ति कहीं अत्यंत स्नेही दिखाई देता है, वही कहीं कठोर नजर आता है। जो किसी के लिए त्याग और समर्पण की मिसाल है, वही किसी दूसरे रिश्ते में उतना उदार नहीं दिखता। तब मन में प्रश्न उठता है- क्या व्यक्ति बदल जाता है, या रिश्तों के साथ उसका व्यवहार बदल जाता है? सच तो यह है कि जीवन एक मंच की तरह है, जहां हर व्यक्ति अनेक भूमिकाएं निभाता है। वह एक साथ पुत्र भी है, पिता भी, मित्र भी, पति भी, कर्मचारी भी और नागरिक भी। हर भूमिका की अपनी अपेक्षाएं, सीमाएं और जिम्मेदारियां होती हैं। इसलिए व्यवहार में अंतर दिखाई देना स्वाभाविक है। समस्या तब शुरू होती है, जब हम इस अंतर को समझे बिना व्यक्ति के पूरे चरित्र का निर्णय कर लेते हैं। अपने बच्चे के लिए एक मां का प्रेम लगभग निस्वार्थ होता है। वह उसकी गलतियों को सुधारने का प्रयास करती है, लेकिन उसके प्रति उसके मन में अपनापन कम नहीं होता। वही महिला अपने पति के साथ जीवन की साझेदार होती है। वहां प्रेम के साथ मतभेद भी होते हैं, जिम्मेदारियां भी होती हैं और अनेक व्यावहारिक निर्णय भी। अपने सास-ससुर के सामने वह बहू होती है, जहां संबंधों के साथ अपेक्षाएं और सामाजिक मर्यादाएं जुड़ी होती हैं। अपने माता-पिता के घर में वह फिर बेटी बन जाती है, जहां बिना किसी संकोच के अपने मन की बात कह सकती है। अपनी सहेलियों के बीच वही महिला सबसे अधिक खुली, हंसमुख और निश्चिंत दिख सकती है। रिश्तों के मुताबिक उसकी अभिव्यक्ति भी बदल रही है। इसी तरह एक व्यक्ति अपनी मां के सामने आज भी बच्चा बना रहता है। वही अपने बच्चों के सामने जिम्मेदार अभिभावक होता है। अपनी बहन के प्रति उसका व्यवहार सुरक्षात्मक हो सकता है, अपने भाई के प्रति प्रतिस्पर्धी और मित्रवत तथा अपने जीवनसाथी के प्रति सहयोग और साझेदारी वाला। हर रिश्ते में भावनाओं का रंग अलग होता है, इसलिए व्यवहार का स्वरूप भी बदल जाता है। कई बार सास अपनी बेटी और बहू के प्रति अलग व्यवहार करती हुई दिखाई देती है। बाहर से देखने पर यह जानबूझ कर किया गया भेदभाव लगता है।
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 12 अक्टूबर 2026 के अंक में पृष्ठ 9 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें




