यदे से भाषाओं के बीच प्रतिस्पर्धा के बजाय सह-अस्तित्व और परस्पर सम्मान की भावना होनी चाहिए, लेकिन ऐसा लगता है कि भाषा को लेकर मतभेद लोकमत से ज्यादा एक राजनीतिक औजार बन गया है। भारत विविधताओं का देश है और यहां अलग-अलग भाषाएं एवं संस्कृतियां क्षेत्रीय विशेषताओं तथा ऐतिहासिकता को रेखांकित करती हैं। भाषा के विभिन्न स्वरूप केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि पहचान, परंपरा और भावनाओं से भी जुड़े हुए हैं। मगर सवाल है कि क्या किसी एक भाषा के संरक्षण और विकास के लिए दूसरी भाषा का विरोध करना या किसी पूर्वाग्रह के आधार पर उसे उपयोगिता के तराजू में तौलना उचित है? तमिलनाडु में एक राजमार्ग के साइनबोर्ड पर शहरों के नाम तमिल और अंग्रेजी के साथ हिंदी में भी लिखे जाने के कारण दो अधिकारियों को निलंबित कर देने की घटना ने देश की विविध भाषाओं की सर्वत्र स्वीकार्यता को लेकर लंबे समय से चली आ रही बहस को फिर तेज कर दिया है। कायदे से भाषाओं के बीच प्रतिस्पर्धा के बजाय सह-अस्तित्व और परस्पर सम्मान की भावना होनी चाहिए, लेकिन ऐसा लगता है कि भाषा को लेकर मतभेद लोकमत से ज्यादा एक राजनीतिक औजार बन गया है। यह सच है कि कुछ राज्यों में हिंदी को लेकर आशंकाएं रही हैं। विशेषकर दक्षिण भारत में हिंदी को अनिवार्य बनाने के विचारों का विरोध भाषाई पहचान और क्षेत्रीय स्वायत्तता से जुड़ा मसला हो सकता है और इन चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। किसी भी भाषा को शिक्षा, रोजगार या प्रशासन में जबरन थोपने के बजाय क्षेत्र के लोगों की सहमति और सुविधा को सर्वोपरि रखा जाना चाहिए। मगर क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने का अर्थ हिंदी का विरोध करना नहीं होना चाहिए। कोई एक भाषा किसी दूसरी भाषा के अस्तित्व के लिए खतरा कैसे हो सकती है! प्रत्येक भाषा अपने समाज की ऐतिहासिक स्मृतियों, साहित्य और सांस्कृतिक विरासत को संजोए हुए है। इसलिए किसी एक भाषा को दूसरी भाषा के मुकाबले खड़ा करना भाषाई सद्भाव को कमजोर करता है। ऐसे में तमिलनाडु की आधिकारिक दो-भाषा नीति पर भी सवाल खड़े होते हैं, जिसमें सिर्फ तमिल और अंग्रेजी को शामिल किया गया है। क्या यह नीति वहां रह रहे हिंदी भाषी लोगों के साथ भेदभाव नहीं करती है?
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 5 अक्टूबर 2026 के अंक में पृष्ठ 9 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें




