इंदौर। दीपावली का त्योहार, बाजारों में रौनक, सजी हुई दुकानें और सड़कों पर खरीदारों की भीड़। पहली नजर में सब कुछ सामान्य दिखाई देता है, लेकिन दुकानदारों की उम्मीदों के अनुरूप खरीदारी नहीं होना एक गंभीर आर्थिक सवाल खड़ा कर रहा है। किराना बाजार से लेकर गृह सज्जा, रेडीमेड कपड़ों और घरेलू उपयोग की वस्तुओं तक ग्राहकों की खरीदारी सीमित रहने की शिकायतें सामने आ रही हैं। सवाल है कि त्योहार मनाने का उत्साह कायम है, फिर उपभोक्ता की जेब खरीदारी में साथ क्यों नहीं दे रही?
महंगाई खा रही है अतिरिक्त आमदनी
आम परिवार की आय का बड़ा हिस्सा राशन, दूध, सब्जी, ईंधन, बिजली, बच्चों की फीस और स्वास्थ्य जैसे जरूरी खर्चों में निकल जाता है। सितंबर 2026 में खुदरा महंगाई दर 5.54% और खाद्य महंगाई दर 7.74% दर्ज की गई। ऐसे में परिवारों के लिए त्योहार की अतिरिक्त खरीदारी का बजट बनाना आसान नहीं है। आय में उसी अनुपात में वृद्धि नहीं होने पर महंगाई का सीधा असर क्रय शक्ति पर पड़ता है।
ईएमआई और बचत की चिंता भी बड़ी वजह
मकान, वाहन और दूसरे कर्ज की किस्तें हर महीने आय का एक हिस्सा पहले ही तय कर देती हैं। इसके साथ भविष्य में शिक्षा, इलाज और पारिवारिक जरूरतों के खर्च की चिंता भी है। ऐसे में उपभोक्ता गैर-जरूरी खरीदारी टालने या कम करने का फैसला ले सकता है। त्योहार पर खरीदारी की इच्छा बनी रहती है, लेकिन खर्च करने की क्षमता सीमित हो जाती है।
किराना से कपड़ों तक बदल रही प्राथमिकता
किराना बाजार में ग्राहक जरूरी सामान खरीदकर अतिरिक्त वस्तुओं से दूरी बना सकता है। गृह सज्जा में पुरानी वस्तुओं से काम चलाया जा रहा है, जबकि रेडीमेड कपड़ों में पूरे परिवार की खरीदारी के बजाय चुनिंदा कपड़ों को प्राथमिकता मिल सकती है। घरेलू उपकरणों और फर्नीचर जैसी महंगी वस्तुओं की खरीद भी आगे टाली जा सकती है।
भीड़ बिक्री की गारंटी नहीं
बाजार में आने वाला हर व्यक्ति खरीदार नहीं होता। कई ग्राहक कीमतों की तुलना करने या ऑनलाइन छूट की जानकारी लेने भी पहुंचते हैं। खरीदारी करने वालों की संख्या बढ़ने के बावजूद प्रति ग्राहक औसत बिल घट जाए, तो दुकानदार की कुल बिक्री अपेक्षा से कम रह सकती है। ऑनलाइन कारोबार की छूट और बदलते खरीदारी के तरीके भी पारंपरिक बाजारों के सामने चुनौती हैं।
व्यापारी के लिए बिक्री के साथ मुनाफा भी जरूरी
त्योहार के लिए व्यापारी पहले से माल खरीदता है। किराया, वेतन, बिजली और अन्य खर्च भी तय रहते हैं। बिक्री कम रहने पर पूंजी स्टॉक में फंस सकती है और माल निकालने के लिए छूट देनी पड़ सकती है। इससे मुनाफे पर दबाव बढ़ता है। इसलिए केवल बिक्री की राशि नहीं, बल्कि बेचे गए सामान की मात्रा और वास्तविक लाभ का आकलन भी जरूरी है।
असली सवाल उपभोक्ता की जेब का
बाजार की स्थिति का सही आकलन पिछले साल की तुलना में बिक्री, बिलों की संख्या, प्रति ग्राहक खर्च और सामान की मात्रा के आधार पर होना चाहिए। अलग-अलग बाजारों के अनुभव पूरे देश की स्थिति साबित नहीं करते, लेकिन लगातार कमजोर खरीदारी की शिकायतों को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। दीपावली की आर्थिक सफलता केवल बाजारों की भीड़ से नहीं मापी जा सकती। असली कसौटी यह है कि आम परिवार जरूरी खर्च पूरे करने के बाद कितना पैसा खरीदारी के लिए बचा पा रहा है। जब उपभोक्ता की जेब में अतिरिक्त पैसा होगा, तभी बाजार की रौनक वास्तविक कारोबार और व्यापारी के मुनाफे में बदल सकेगी।
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 25 अक्टूबर 2026 के अंक में पृष्ठ 10 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें


