सोमवार, 12 अक्टूबर 2026
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संपादकीय कुकी समुदाय के ‘काला दिवस’ पर मणिपुर में हिंसा, क्या फिर तेज होगा जातीय संघर्ष कु

13 सितंबर को काला दिवस मनाता है। किसी भी सरकार की यह नीतिगत और नैतिक जिम्मेदारी होती है कि समाज में शांति एवं सौहार्द बना रहे। तभी आम लोगों को…

13 सितंबर को काला दिवस मनाता है। किसी भी सरकार की यह नीतिगत और नैतिक जिम्मेदारी होती है कि समाज में शांति एवं सौहार्द बना रहे। तभी आम लोगों को विकास की मुख्य धारा से जोड़ा जा सकता है। मगर, लंबे समय से जातीय हिंसा और सामाजिक तनाव से जूझ रहे मणिपुर में ऐसा कुछ नजर नहीं आ रहा है। आए दिन हिंसक घटनाओं का राज्य की सामाजिक संरचना, अर्थव्यवस्था और जनजीवन पर गहरा असर पड़ रहा है। हालांकि, हालात में कई बार सुधार के संकेत दिखाई दिए, लेकिन तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। पिछले कुछ समय से स्थिति फिर बिगड़ने लगी है। इसी का नतीजा है कि राज्य के तामेंगलोंग और नोनी जिलों में बीते रविवार को उग्रवादियों के हमलों में दो महिलाओं सहित चार लोगों की मौत हो गई। इस पर सरकार का कहना है कि निर्दोष नागरिकों के खिलाफ हिंसा पूरी तरह अस्वीकार्य है और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। मगर, सवाल है कि अगर सरकार इस मसले पर इतनी गंभीर है और इससे निपटने के लिए जरूरी कदम उठा रही है, तो फिर धरातल पर उसका असर दिखाई क्यों नहीं दे रहा है दरअसल, मणिपुर की समस्या केवल जातीय संघर्ष तक सीमित नहीं है। इसके पीछे प्रशासनिक व्यवस्था, रोजगार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संसाधनों को लेकर समुदायों के बीच लंबे समय से चले आ रहे अविश्वास जैसे कई जटिल कारण भी हैं। इसलिए केवल सुरक्षा बलों की तैनाती या तनावग्रस्त इलाकों में प्रतिबंध लगाने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो पाएगा। हिंसा को रोकना जरूरी है, लेकिन उसके साथ उन कारणों को समझना और दूर करना भी आवश्यक है, जिनसे तनाव बार-बार पैदा होता है। हिंसा की ताजा घटनाएं कुकी समुदाय की ओर से मनाए जाने वाले ‘काला दिवस’ के मौके पर हुईं। यह समुदाय वर्ष 1990 के दशक में राज्य में कुकी-नगा संघर्ष के दौरान मारे गए लोगों की याद में हर साल 13 सितंबर को काला दिवस मनाता है। जाहिर है कि इस समुदाय के लोग उग्रवादियों के हमले को जातीय हिंसा से जोड़कर देख रहे हैं। कुकी-जो काउंसिल का कहना है कि सशस्त्र समूहों की गतिविधियां आम नागरिकों की जान पर भारी पड़ रही हैं और इससे राज्य में फिर से जातीय संघर्ष तेज होने का खतरा है। मणिपुर में विस्थापन भी एक गंभीर समस्या है। हिंसा के कारण बड़ी संख्या में लोग अपने घर छोड़कर लंबे समय से राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं। इन लोगों की घर वापसी केवल प्रशासनिक आदेश से संभव नहीं होगी, उन्हें सुरक्षा का भरोसा, आजीविका के साधन और संपत्ति तथा पुनर्वास को लेकर ठोस उपायों की जरूरत है। सबसे पहले सरकार को आम लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। हिंसा की आशंका वाले क्षेत्रों में पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था और संवेदनशील इलाकों में प्रशासन की मौजूदगी दिखाई देनी चाहिए। किसी भी समुदाय के खिलाफ हिंसा या उकसावे की कार्रवाई पर निष्पक्ष और सख्त कदम उठाए जाने चाहिए। कानून का पालन तभी प्रभावी होगा, जब लोगों को यह भरोसा हो कि प्रशासन किसी पक्ष के साथ भेदभाव नहीं कर रहा है। सरकार को तात्कालिक संकट से आगे बढ़कर दीर्घकालिक समाधान पर ध्यान केंद्रित करना होगा। सबसे बड़ी चुनौती विश्वास बहाली की है। जिन लोगों ने हिंसा और विस्थापन का दर्द झेला है, उनके भीतर भय और असुरक्षा का होना स्वाभाविक है। सरकार की ओर से पीड़ितों को सुरक्षा, न्याय, पुनर्वास और सम्मान का भरोसा देना होगा।

इंदौर। बाणगंगा थाना क्षेत्र में एम.आर.10 ब्रिज स्थित वाइन शॉप पर तीन बदमाशों द्वारा एक युवक से मारपीट कर बीयर पिलवाने और फिर हथियारों के दम पर पर्स व मोबाइल लूटने की सनसनीखेज वारदात सामने आई है। बदमाशों ने मोबाइल का पासवर्ड और यूपीआई पिन पूछकर फरियादी के बैंक खाते व क्रेडिट कार्ड से करीब 55 हजार रुपये भी ट्रांसफर करवा लिए। फरियादी की शिकायत पर बाणगंगा पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोपियों की तलाश शुरू कर दी है।

पुलिस के अनुसार, सेक्टर

यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 15 सितम्बर 2026 के अंक में पृष्ठ 9 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें