और अवैध की नई परिभाषा को पहचानने के लिए तैयार हो जाइए, इंदौर नगर निगम ने शहर की अवैध और वैध कॉलोनीयों की संपत्तियों को नई पहचान देने का निर्णय ले लिया है। महापौर परिषद की बैठक कल मंगलवार सम्पन्न हुई जिसमें पहली बार यह निर्णय नगर निगम ने अपना राजस्व बढ़ाने के उद्देश्य से लिया है, जिसके अनुसार अवैध कॉलोनियों और कब्जा करके बनाए गए निर्माण का संपत्तिकर वसूलेगा। लेकिन इसकी रसीद पर अधिवासी शब्द दर्ज रहेगा जिससे यह पहचान हो सकेगी कि उक्त संपत्ति अवैध है और इसकी रजिस्ट्री नहीं की जा सकती। वहीं दूसरी ओर वैध कॉलोनी और स्वयं के स्वामित्व वाली संपत्तियों पर अधिभोगी शब्द दर्ज किया जाएगा जिससे यह पहचान हो सकेगी कि उक्त संपत्ति लीगल है और वैधानिक प्रक्रिया को पूरा करते हुए खरीद बिक्री हुई है, लेकिन व्यावहारिक रूप से यहां सवाल यह उठता है कि आम नागरिक इस अंतर को कैसे पहचानेंगे और संपत्तियों की खरीद बिक्री एवं नामांतरण के दौरान आम नागरिक दलालों के चक्कर में न फंसे इसके लिए कौन से कदम उठाए जाएं इस पर बैठक में कोई विचार नहीं किया गया है। हालांकि अभी नगर निगम अधिकारियों और कर्मचारी को भी यह समझने में 4 से 6 माह का समय लग जाएगा कि अधिभोगी वैध संपत्ति के लिए उपयोग किया जा रहा है और अधिवासी शब्द का उपयोग अवैध संपत्ति के लिए हो रहा है। इससे भ्रम की स्थिति उत्पन्न होगी। निगम के कर्मचारियों को भी यह अच्छे से दिमाग में बैठाना होगा कि दोनों शब्दों का कितना महत्व है और दर्ज करने से पहले इसकी जांच की जाए क्योंकि यह भी स्थिति बन सकती है कि वैध को अवैध और अवैध को वैध संपत्ति की श्रेणी में दर्ज ना किया जाए। सबसे बड़ी परेशानी अवैध बस्तियों में रहने वाले कम पढ़े- लिखे और गरीब लोगों की है इन्हें शातिर ठग और दलाल इन शब्दों के मायाजाल में उलझा कर इनके साथ ठगी कर सकते हैं वहीं यह शब्द ऐसे हैं जो आम लोगों के प्रचलन एवं जुबान पर नहीं है। नगर निगम आयुक्त क्षितिज सिंघल ने बताया कि उक्त निर्णय के लेने के पीछे नगर निगम के राजस्व में बढ़ोतरी करना है क्योंकि ऐसी संपत्तियों जो कब्जा करके बनाई गई है या फिर अवैध कॉलोनी का निर्माण सरकारी जमीन पर किया गया है ऐसी संपत्तियों के संपत्ति कर खाते नहीं खोले जाने के कारण निगम को राजस्व की हानि हो रही है। ऐसी संपत्ति जहां स्थित है वहां पर नगर निगम द्वारा सफाई, बिजली, नर्मदा, पानी, सड़क, स्ट्रीट लाइट, कचरा कलेक्शन जैसी सुविधा दे रहा है तो फिर नगर निगम राजस्व लेने का हकदार क्यों नहीं है जब तक ऐसी संपत्तियों को हटाए जाने की कार्रवाई निगम की ओर से नहीं की जाती तब तक ऐसी संपत्तियों का टैक्स निगम को मिलना चाहिए।
वही इस मामले में राजस्व विभाग के अपर आयुक्त आकाश सिंह ने बताया कि अधिभोगी और अधिवासी शब्द के माध्यम से संपत्तियों की पहचान हो सकेगी इस संबंध में वरिष्ठ जिला पंजीयन कार्यालय को पत्र लिखा गया है कि वह संपत्तियों का पंजीयन करते समय उस बात का ध्यान रखें की पंजीयन से पहले संपत्ति किस श्रेणी में दर्ज है इसका रिकॉर्ड देख ले इसके बाद ही संपत्ति की रजिस्ट्री की जाए। इस कदम से अवैध संपत्तियों की रजिस्ट्री नहीं होगी और यह संपत्तियां अवैध संपत्ति के रूप में दर्ज रहेगी। वही इस निर्णय को महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने सही करार देते हुए कहा है कि शहर तेजी से बढ़ रहा है नगर निगम को संसाधन जुटाने के लिए नए आय के स्रोत चाहिए। अवैध संपत्तियों का टैक्स लिया जाना उचित है क्योंकि इन संपत्ति स्वामियों द्वारा नगर निगम द्वारा दी जा रही सभी सुविधाओं का उपयोग किया जा रहा है ऐसी स्थिति में इस टैक्स की वसूली होनी चाहिए ताकि नगर निगम की सेवाओं को सुचारू रूप से जारी रखा जाए। वहीं इस मामले को लेकर कांग्रेस नेता चिंटू चौकसे ने बताया कि नगर निगम के इस निर्णय के बाद अवैध संपत्तियों का टैक्स चुकाने वाला स्वयं को उस संपत्ति का टैक्स उसके द्वारा चुकाया जा रहा है ऐसी स्थिति में वह अवैध संपत्ति को वैध बताकर बेच देगा। तकनीकी भाषा और शुद्ध हिंदी आम नागरिक इतनी जल्दी नहीं समझ पाए इसीलिए अच्छा यह होता कि रसीद पर सीधे तौर पर कब्जा धारी लिखा जाए और उक्त संपत्ति की खरीद बिक्री नहीं होगी यह रशीद और रिकॉर्ड दोनों पर अंकित होना चाहिए तभी आम नागरिक इसके प्रति अलर्ट रह सकेंगे और अपनी संपत्ति को सुरक्षित कर सकेंगे।
कांग्रेस नेता चौकसे ने कहा कि नगर निगम को उन शिकायतों के लिए तैयार रहना चाहिए जिसमें वैध संपत्ति अवैध श्रेणी में और अवैध को वैध दर्ज हो जाएगी, इसके निर्णय के लिए अभी से नगर निगम में हेल्प डेस्क स्थापित की जानी चाहिए।
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 19 अगस्त 2026 के अंक में पृष्ठ 10 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें




