देश के सबसे स्वच्छ शहर की पहचान इस समय गंभीर संकट से गुजर रही है। जिस इंदौर की स्वच्छता को लेकर पिछले नौ वर्षों से राजनीति होती रही, स्वच्छता के नाम पर वोट और सुर्खियां बटोरी जाती रहीं, उसी शहर में सफाई व्यवस्था ठप होने के बाद जिम्मेदारों की सक्रियता नजर नहीं आ रही। बात-बात पर स्वच्छता अवार्ड का श्रेय लेने वाले जनप्रतिनिधि और नेता इस संकट के समय खामोश हैं। दिल्ली में होने वाले स्वच्छता पुरस्कारों को लेने की होड़ में आगे रहने वाले अब शहर की सड़कों पर फैले कचरे के सवाल पर पीछे दिखाई दे रहे हैं।
फुटपाथ और ग्रीन बेल्ट में फेंका जा रहा कचरा
सफाई कर्मचारियों की हड़ताल का असर अब साफ दिखाई देने लगा है। लगातार तीसरे दिन कई क्षेत्रों में कचरा गाड़ियां नहीं पहुंचीं। घरों में दो दिन से जमा कचरा अब सड़कों और खाली जगहों पर पहुंचने लगा है। ग्रीन बेल्ट और फुटपाथ पर भी कचरा दिखाई देने लगा है। कई लोगों को अब तक यह जानकारी तक नहीं है कि नगर निगम में हड़ताल चल रही है। वे कचरा गाड़ी नहीं आने को वाहन खराब होने या ड्राइवर के छुट्टी पर होने से जोड़ रहे हैं।
अफसरों के दावे जमीन पर फेल
नगर निगम अधिकारियों ने हड़ताल की आशंका को देखते हुए आउटसोर्स और एनजीओ कर्मचारियों से सफाई कराने की बात कही थी, लेकिन शहर के कई हिस्सों में यह वैकल्पिक व्यवस्था नजर नहीं आई। न कचरा गाड़ियां पहुंचीं और न सड़कों पर नियमित झाड़ू लगी। इससे साफ है कि निगम की वैकल्पिक व्यवस्था फिलहाल कर्मचारियों की कमी की भरपाई नहीं कर पा रही है। दो दिन तक लोगों ने कचरा घरों में ही जमा रखा, लेकिन अब तीसरे दिन स्थिति बदलने लगी है। कई जगह लोग मजबूरी में आसपास कचरा डाल रहे हैं। यदि हड़ताल जल्द खत्म नहीं हुई तो इसका सीधा असर शहर की सफाई व्यवस्था और सार्वजनिक स्थानों पर दिखाई देगा। पुष्यमित्र भार्गव ने इस मामले में नगर निगम कर्मचारियों से काम पर लौटने की अपील की है। उन्होंने कहा है कि सभी मांगे नगर निगम अपने स्तर पर पूरी नहीं कर सकता है। कर्मचारियों के कई निर्णय शासन स्तर से लिए जाने हैं, जिसको लेकर हम लगातार अनुशंसा और प्रस्ताव भेज रहे हैं नियमितीकरण को लेकर भी प्रस्ताव भेजा गया है। सभी कर्मचारी अपने- अपने काम पर लौटे शहर की सफाई से खिलवाड़ नहीं किया जाए यही इंदौर की पहचान है। वहीं दूसरी ओर महापौर पुष्यमित्र भार्गव एवं अधिकारियों के बीच में इस समस्या के निराकरण को लेकर समन्वय कम दिखाई दे रहा है। इंदौर के वाल्मीकि समाज और पंचायतों से कोई चर्चा नहीं की गई है।
स्वच्छता का गुरु है इंदौर
नौ साल से स्वच्छता की उपलब्धियों का चेहरा बने इंदौर के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि संकट के समय शहर की सफाई व्यवस्था की जिम्मेदारी कौन संभालेगा? यदि हड़ताल लंबी खिंची तो वह तस्वीर सामने आ सकती है, जिसे इंदौर ने पिछले वर्षों में देखा तक नहीं है, 2015 के पहले इंदौर में बड़ी मात्रा में कचरा पेटियां और उसके आसपास सूअर और आवारा पशु गंदगी के ढेर पर झुंड बने रहते थे।
प्रदेश स्तरीय हड़ताल से राष्ट्रीय स्तर पर इंदौर की छवि धूमिल
कर्मचारियों की हड़ताल भले ही प्रदेश स्तरीय हो लेकिन बदनामी इंदौर की हड़ताल के कारण राष्ट्रीय स्तर पर हो रही है। इंदौर शहर अपने आप को स्वच्छता का गुरु कहता है और स्वच्छता का पाठ पड़ने वाला शहर ही कचरे से पटा हुआ नजर आए तो फिर यह तस्वीर इंदौर के गर्व और अभियान को खत्म करने से नहीं चूकेगी और इसका फायदा देश के अन्य शहर जो इंदौर को पीछे करने में लगे हैं वह उठाएंगे।
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 7 अक्टूबर 2026 के अंक में पृष्ठ 5 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें




