अपने वाहन निर्धारित पार्किंग स्थल के बजाय सड़क पर खड़े कर देते हैं। देश में सड़कों पर अतिक्रमण एक गंभीर समस्या बन गई है। कहीं सड़क किनारे अवैध तरीके से मकानों का विस्तार कर दिया जाता है, फुटपाथ पर दुकानें खड़ी कर दी जाती हैं, तो कहीं वाहनों को बेतरतीब ढंग से सड़क पर खड़ा कर दिया जाता है। खासकर वाहनों की संख्या में लगातार हो रही बढ़ोतरी के साथ ही सड़कों का एक बड़ा हिस्सा अवैध पार्किंग, सामान लादने- उतारने और अन्य अस्थायी उपयोगों में घिरता जा रहा है। परिणामस्वरूप सड़कों का दायरा सिकुड़ रहा है, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। राष्ट्रीय राजमार्गों से लेकर संपर्क मार्गों तक पर यही स्थिति देखने को मिलती है। यह सड़क परिवहन विभाग और यातायात पुलिस की लापरवाही का ही नतीजा है कि अतिक्रमण की वजह से होने वाली दुर्घटनाओं में हर साल बड़ी संख्या में निर्दोष लोग अपनी जान गंवा देते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने बीते गुरुवार को इस पर चिंता जताते हुए भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण से पूछा कि वह समस्या से निपटने के लिए कैमरा निगरानी प्रणाली और टोल प्लाजा पर निगरानी कक्ष क्यों नहीं स्थापित कर सकता? देश भर में यह देखने को मिलता है कि बाजारों, कार्यालयों, अस्पतालों, स्कूलों और आवासीय क्षेत्रों में लोग अक्सर अपने वाहन निर्धारित पार्किंग स्थल के बजाय सड़क पर खड़े कर देते हैं। कई स्थानों पर दोपहिया और चारपहिया वाहन फुटपाथ तक घेर लेते हैं, जिससे पैदल यात्रियों को सड़क पर चलने के लिए मजबूर होना पड़ता है। इससे यातायात व्यवस्था प्रभावित होती है और पैदल यात्रियों की सुरक्षा भी खतरे में पड़ती है। पर्याप्त और व्यवस्थित पार्किंग सुविधाओं की कमी इस समस्या को और जटिल बना देती है। मगर सवाल है कि ऐसे मामलों में सड़क सुरक्षा नियमों का पालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी संभालने वाली यातायात पुलिस की जवाबदेही तय क्यों नहीं की जाती है? गलत जगह वाहन खड़ा करने पर नियमित और निष्पक्ष कार्रवाई क्यों नहीं की जाती है? ऐसे स्थानों को चिह्नित कर वहां कैमरा प्रणाली से निगरानी क्यों नहीं की जाती?
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 5 सितम्बर 2026 के अंक में पृष्ठ 9 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें




