58 रेलवे स्टेशनों पर सुविधाओं की कमी और पानी में ई-कोलाई जैसे बैक्टीरिया मिले हैं। किराया बढ़ाने में तत्पर रेलवे स्वच्छ पेयजल देने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है। रेलवे स्टेशनों से लेकर ट्रेन में सफर के दौरान परोसे या बेचे जाने वाले खानपान की घटिया गुणवत्ता के मामले अक्सर सामने आते रहे हैं। मगर कैग की रिपोर्ट में पीने के पानी में भी जिस तरह की गड़बड़ी बताई गई है, उससे व्यापक लापरवाही का ही पता चलता है। गौरतलब है कि हाल ही में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी कैग की एक रिपोर्ट में ये तथ्य सामने आए कि देश के कई रेलवे स्टेशनों के पानी में ई-कोलाई और कोलीफार्म जैसे जीवाणु पाए गए हैं। इस दौरान पांच सौ बारह स्टेशनों की जांच में चार सौ अट्ठावन पर जरूरी यात्री सुविधाओं की कमी मिली। रेल महकमा समय-समय पर किराया बढ़ाने को लेकर तो जरूरत से ज्यादा सजग दिखता है, लेकिन स्वच्छ पेयजल जैसी सबसे जरूरी चीज की भी उपलब्धता सुनिश्चित करने की उसे शायद कोई फिक्र नहीं है। लोगों को या तो स्टेशन पर लगे नल से असुरक्षित पानी पीना पड़ता है या फिर बोतलबंद पानी खरीदना पड़ता है। अब भले रेलवे ने पेयजल की गुणवत्ता सुधारने की बात कही है, लेकिन यह कब संभव होगा, यह देखने की बात होगी। यह जगजाहिर तथ्य है कि ट्रेन से अपने गंतव्य के लिए निकले लोग कई बार एक या दो दिन की लंबी यात्रा भी करते हैं। इस दौरान पानी न मिलने या फिर दूषित पेयजल की वजह से लोगों की सेहत बिगड़ने के मामले जब-तब सामने आते रहते हैं। सवाल है कि अगर टिकट लेकर यात्रा करने वाले यात्रियों को स्वच्छ पेयजल जैसी सबसे बुनियादी चीज भी मुश्किल से मिल पाती है, तो सरकार किस भरोसे भारतीय रेल को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाने के दावे करती रहती है! कुछ महंगी और अति-महत्त्वपूर्ण मानी जाने वाली ट्रेनों को छोड़ दें, तो क्या साधारण लोगों के लिए भी रेल यात्रा उतनी ही सहज या सुकूनदेह रह गई है? ट्रेन में सीट पर आराम से बैठ कर यात्रा कर पाना जहां चुनौती बन चुकी है, वहीं सफर के दौरान खाने-पीने का सामान कैसा मिलता है, यह अब कोई छिपी हकीकत नहीं रह गई है। मगर सबसे बुनियादी चीज- पीने के पानी तक की हालत अगर ऐसी है कि ज्यादातर स्टेशनों पर लगे नले से दूषित पेयजल मिलता है, तो इससे उपजे जोखिम के लिए कौन जिम्मेदार है? देश में जब कभी भगदड़ की कोई घटना होती है, तो सरकार की ओर से आश्वासनों के जरिए यही संदेश दिया जाता है कि भविष्य में इस तरह के हादसों से बचने के लिए व्यवस्था में सुधार कर पुख्ता प्रबंध किए जाएंगे। मगर इन दावों की हकीकत तब सामने आती है, जब कुछ दिन बाद दूसरी जगह इसी तरह का हादसा हो जाता है।
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 18 अगस्त 2026 के अंक में पृष्ठ 9 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें




