मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और सरकार की ओर से परीक्षा प्रणाली में सुधार के आश्वासन के बाद ही समाप्त हुआ था। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर समेत देश भर में विद्यार्थियों के सड़क पर आवाज बुलंद करने के बाद हरकत में आई सरकार की ओर से प्रवेश एवं प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिए लाए गए ‘लोक परीक्षा (अनुचित साधन निवारण) संशोधन विधेयक, 2026’ को बुधवार को लोकसभा की मंजूरी मिल गई। उम्मीद की जा रही थी कि विद्यार्थियों के आंदोलन से निकले इस विधेयक की अहमियत के मद्देनजर संसद में इस पर व्यापक और सार्थक चर्चा होगी, इसकी कमियों पर विचार होगा और नए सुझाव सामने आएंगे, जिनके आधार पर एक सशक्त कानून बनाया जाएगा। मगर, इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि चर्चा का यह दौर भी हंगामे की भेंट चढ़ गया, जिसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्ष का आरोप है कि उसे बोलने नहीं दिया गया, वहीं सत्तापक्ष का कहना है कि विपक्षी नेताओं ने विधेयक पर चर्चा को केंद्र में नहीं रखा। विपक्ष सड़क से लेकर संसद तक विद्यार्थियों पर प्रदर्शन के दौरान बल प्रयोग का मुद्दा लगातार उठाता रहा है। अब सर्वोच्च न्यायालय ने भी संकेत दिया है कि वह पुलिस की सख्ती से जुड़े मामले की जांच के लिए विशेष दल का गठन कर सकता है। काकरोच जनता पार्टी के आह्वान पर शुरू हुआ विद्यार्थियों का आंदोलन तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और सरकार की ओर से परीक्षा प्रणाली में सुधार के आश्वासन के बाद ही समाप्त हुआ था। लोक परीक्षा (अनुचित साधन निवारण) संशोधन विधेयक इन्हीं सुधारों की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है। माना जा रहा था कि इस विधेयक में अगर कोई कमी रह गई होगी, तो संसद में व्यापक चर्चा के दौरान पेश किए जाने वाले सुझावों के माध्यम से इसे दूर किया जा सकता है। मगर चर्चा के दौरान लोकसभा में जिस तरह का माहौल देखा गया, उससे यह विश्वास करना मुश्किल है कि शिक्षा प्रणाली में सुधार के लिए वास्तव में सख्त एवं सक्षम कानून बनाने के गंभीर प्रयास हुए हों। विपक्ष की ओर से सवाल उठाना स्वाभाविक है, लेकिन यह सत्तापक्ष का दायित्व है कि वह आशंकाओं का निवारण करे और चर्चा को सही दिशा में ले जाए। अगर संसद में बिना सार्थक चर्चा के ही किसी विधेयक को पारित कर दिया जाए, तो जाहिर है कि उस पर भविष्य में भी सवाल उठते रहेंगे। दूसरी ओर विद्यार्थियों के प्रदर्शन के दौरान उन पर बल प्रयोग का मुद्दा भी अहम है। यह प्रश्न शुरू से उठता रहा है कि क्या सुरक्षाबलों के लिए यही एक अंतिम विकल्प था? अगर विद्यार्थियों के संसद मार्च से पहले ही सरकार ने संवाद के जरिए उन्हें भरोसे में लेने की कोशिश की होती, तो संभवत: इस स्थिति को टाला जा सकता था। सवाल प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन और एके-47 राइफल से गोलियां चलाने को लेकर भी उठा है। खबरों के मुताबिक, दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी के कहने पर त्वरित कार्रवाई बल ने पैलेट गन समेत कई कम घातक हथियारों का इस्तेमाल किया था। यही वजह है कि सर्वोच्च न्यायालय ने इस पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच पर जोर देते हुए विशेष दल गठित करने का संकेत दिया है। साथ ही अदालत ने अठारह वर्ष से कम आयु के उन लोगों को रिहा करने का निर्देश दिया है, जिनका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। बहरहाल, सत्तापक्ष हो या विपक्ष, दोनों की कोशिश यही होनी चाहिए कि देश की शिक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार हो, ताकि विद्यार्थियों को भविष्य में किसी परेशानी का सामना न करना पड़े।
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 30 जुलाई 2026 के अंक में पृष्ठ 9 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें




