बढ़ती हिमनद झीलें तबाही का 'वॉटर बम' बन रही हैं। नेपाल में पिछले दिनों आई भयंकर बाढ़ की त्रासदी ने उस चेतावनी को और भी गंभीर एवं संवेदनशील बना दिया है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से जूझ रहे हिमालय में ऐसे खतरे पल रहे हैं, जो कभी भी विनाशकारी रूप ले सकते हैं। इस जोखिम की जद में कई देश हैं, जिनमें भारत भी शामिल है। हिमालय मनुष्य के लिए प्राकृतिक संपदा का महत्त्वपूर्ण आधार है। यहां से निकलने वाली नदियां पठारी और मैदानी इलाकों को सींचती हैं तथा पेयजल एवं ऊर्जा जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा करती हैं। मगर बढ़ते वैश्विक ताप की वजह से हिमालयी हिमनद अब तेजी से पिघल रहे हैं, जिस कारण उनके आसपास बनने वाली झीलों का आकार और संख्या भी बढ़ रही है। पूर्वी हिमालयी क्षेत्र में स्थित सिक्किम में हाल में ऐसी चालीस झीलों की पहचान की गई है, जिनमें से सोलह को सर्वाधिक जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है। इसी तरह हिमाचल प्रदेश के मंडी में स्थित आइआइटी के शोधकर्ताओं ने राज्य में नौ हिमनद झीलों को चिह्नित किया है, जिनका आकार तेजी से बढ़ रहा है। ये झीलें देखने में शांत और सुंदर लगती हैं, लेकिन इनमें जमा हो रहा पानी कभी भी तटबंध तोड़कर भारी तबाही मचा सकता है। ऐसे में अहम सवाल यह है कि हिमालय से सटे भारत के पहाड़ी राज्य इस तरह की संभावित आपदा से निपटने के लिए कितने तैयार हैं? उपग्रह से मिलने वाली तस्वीरों और हवाई सर्वेक्षण के जरिए हिमनद झीलों की स्थिति की निगरानी की जा सकती है, लेकिन क्या यह कार्य नियमित रूप से हो पा रहा है? इसका अंदाजा वर्ष 2013 में उत्तराखंड के केदारनाथ में आई प्रलयंकारी बाढ़ की विभीषिका से लगाया जा सकता है। यह बाढ़ चोटी पर स्थित एक झील के फटने से आई थी। सरकारी तंत्र इस खतरे का समय रहते पता लगाने और इससे होने वाले नुकसान को कम करने में नाकाम रहा। जाहिर है कि इस तरह के खतरों की नियमित निगरानी के साथ पूर्व चेतावनी प्रणालियों को भी स्टीक एवं मजबूत बनाने की जरूरत है। मौजूदा पूर्व-चेतावनी प्रणालियों को कुछ खास खतरों को ध्यान में रखकर बनाया गया है, जिनमें नेपाल में हिमनद और चट्टानों के खिसकने से आई बाढ़ के जैसे प्राकृतिक पहलू शामिल नहीं हैं। ऐसी स्थिति में शोधकर्ताओं की स्पष्ट चेतावनी है कि अगर हिमालयी राज्यों में चिह्नित हिमनद झीलों को रोकने वाली प्राकृतिक बाधाएं टूटती हैं, तो ये ‘पानी बम’ की तरह तबाही मचा सकती हैं। चूंकि, हिमालय में पल रहा यह खतरा किसी एक देश की सीमा में नहीं बंधा है, इसलिए क्षेत्रीय पूर्व-चेतावनी प्रणाली को राष्ट्रीय और सीमा-पार निगरानी से जोड़ने की नितांत आवश्यकता है, ताकि इसकी जानकारी समय रहते उन लोगों तक पहुंचाई जा सके, जो सबसे ज्यादा जोखिम में हैं। इसके लिए आधुनिक तकनीक के साथ-साथ संस्थागत बदलावों और मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की भी जरूरत है। आपदा चेतावनी तंत्र को सीमाओं के बंधन से परे एक साझा मानवीय व्यवस्था के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। इसके अलावा, हिमनद झीलों से बढ़ता खतरा हमें प्रकृति के साथ संतुलित विकास का संदेश भी देता है। हिमालय को केवल सड़क, बांध और पर्यटन के अवसर के रूप में देखने के बजाय एक संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र के तौर पर समझना होगा। समय रहते सावधानी बरती जाए, तो हिमनद झीलों को निश्चित रूप से बड़े विनाश का कारण बनने से रोका जा सकता है।
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 7 सितम्बर 2026 के अंक में पृष्ठ 9 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें




