देने की नीति को जमीन पर उतारने की कोशिश कर रही है, लेकिन सड़क हादसों के मूल प्रश्न पर ध्यान कम ही दिया जा रहा है। दुर्घटनाओं के इन आंकड़ों से यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सरकार के लिए सिर्फ सड़कों का निर्माण ही प्राथमिकता है, सुरक्षा के पहलू का उसके लिए कोई महत्त्व नहीं है? सड़क एवं परिवहन सुविधाओं का विकास किसी भी देश की प्रगति, आर्थिक वृद्धि और सामाजिक उत्थान की रीढ़ होता है। व्यापार को गति देने, दूरदराज के क्षेत्रों को आपस में जोड़ने और आम जनजीवन को सरल बनाने में इसकी अहम भूमिका होती है। भारत में भी नई सड़कों के निर्माण और पहले से बने मार्गों के चौड़ीकरण पर जोर दिया जा रहा है, लेकिन सवाल है कि विकास के इस पथ पर सुरक्षित सफर की प्रतिबद्धता पीछे क्यों छूटती जा रही है? एक तरफ केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से सड़क सुरक्षा को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, तो दूसरी तरफ देश भर में सड़क दुर्घटनाएं साल-दर-साल बढ़ती जा रही हैं। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की ओर से बीते गुरुवार को लोकसभा में जो आंकड़े पेश किए गए, वे स्थिति के भयावह होने की ओर इशारा करते हैं। मंत्रालय के मुताबिक, देश में वर्ष 2025 में सड़क दुर्घटनाओं में 5.3 फीसद की बढ़ोतरी हुई है। इस दौरान 5.13 लाख से ज्यादा सड़क हादसे हुए, जिनमें 1.83 लाख से अधिक लोगों की जान चली गई। दुर्घटनाओं के इन आंकड़ों से यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सरकार के लिए सिर्फ सड़कों का निर्माण ही प्राथमिकता है, सुरक्षा के पहलू का उसके लिए कोई महत्त्व नहीं है? कहने को सरकार की ओर से सड़क हादसों को कम करने के लिए कई योजनाएं, कार्यक्रम और विशेष अभियान शुरू किए गए हैं, फिर क्या वजह है कि सड़कों पर लोगों की जान जाने का सिलसिला बदस्तूर जारी है! पिछले वर्ष देश में वाहनों की तेज रफ्तार के कारण सबसे ज्यादा 82 हजार से अधिक सड़क दुर्घटनाएं हुईं, जो कुल सड़क हादसों का लगभग सोलह फीसद है। इस मामले में देखा जाए, तो राष्ट्रीय राजमार्गों और शहरी क्षेत्र की सड़कों पर जगह-जगह वाहनों की गति मापने के लिए सीसीटीवी और दूसरे यंत्र लगाए गए हैं। ऐसे में अगर आज भी सबसे ज्यादा सड़क दुर्घटनाएं वाहनों की तेज गति के कारण ही हो रही हैं, इसे किस तरह देखा जाएगा। जाहिर है कि जब किसी व्यवस्था की सही तरीके से निगरानी, देखरेख और उसके आधार पर ईमानदारी से सुधार की दिशा में कार्य नहीं होगा, तो सकारात्मक नतीजे की उम्मीद भी कैसे की जा सकती है! सरकारी रिपोर्ट से पता चलता है कि गलत दिशा में वाहन चलाने और लेन के नियमों का पालन न करने के कारण पिछले वर्ष करीब चार हजार सड़क दुर्घटनाएं हुईं, जबकि लाल बत्ती पार करने से 276 और वाहन चलाते समय मोबाइल फोन के इस्तेमाल की वजह से 136 सड़क हादसे हुए। इस वर्ष के पहले छह महीनों में भी देश भर में कुल सड़क दुर्घटनाओं का आंकड़ा 2.85 लाख को पार कर गया है। सवाल है कि अगर सड़कों पर यातायात नियमों का पालन नहीं हो रहा है, तो यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी है? जिन सड़कों के निर्माण में खामियों और गड्ढों की वजह से हादसे होते हैं, उसके लिए कौन जवाबदेह है? सरकार की ओर से जब तक इन सवालों के उत्तर तलाशने के लिए ईमानदारी से प्रयास नहीं किए जाएंगे, तब तक सड़क दुर्घटनाओं पर अंकुश लगाना संभव नहीं होगा। सरकार अब ईंधन की खपत और वाहनों से प्रदूषण को कम करने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने की नीति को जमीन पर उतारने की कोशिश कर रही है, लेकिन सड़क हादसों के मूल प्रश्न पर ध्यान कम ही दिया जा रहा है।
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 1 अगस्त 2026 के अंक में पृष्ठ 9 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें




