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हैं। आप उनसे अपनी हर बात न.प्र.)। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम सब कहीं न कहीं थक गए हैं। मोबाइल, शोर, टेंशन और लोगों की बातें… मन भारी हो जाता है। लेकिन क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि जब हम पेड़ों के नीचे बैठते हैं, तो सब कुछ हल्का लगने लगता
पेड़ सबसे व़फादार दोस्त होते
कह सकते हैं। अपने ऱाज, अपने आँसू, अपनी खुशियाँ। वो सुनते हैं, समझते हैं, और कभी किसी को बताते नहीं। न जज करते हैं, न सवाल पूछते हैं। बस अपनी छांव दे देते हैं। वैज्ञानिक भी मानते हैं कि पेड़ों के पास बैठने से स्ट्रेस कम होता है, बीपी नॉर्मल होता है और मन को शांति मिलती है। इसे ही ‘ट्री थेरेपी’ या ‘फारेस्ट बाथिंग’ कहते हैं। प्रकृति जल्दी नहीं करती, पर जो करती है सबसे खूबसूरत करती है। हर पत्ते की सरसराहट, हर ठंडी हवा, मिट्टी की खुशबू… ये सब हमारी सबसे बड़ी दवा हैं। शहर का शोर हमें थका देता है, और प्रकृति की खामोशी हमें जीना सिखा देती है। जब मन उदास हो, तो किसी पार्क में जाइए, किसी पेड़ को गले लगाइए, जमीन पर नंगे पैर चलिए। आप देखेंगे आधे गम खुद-ब-खुद कम हो जाएंगे। प्रकृति से जुड़ना मतलब खुद से जुड़ना है। क्योंकि हम भी इसी मिट्टी से बने हैं। इसलिए अगली बार जब परेशान हों, तो डॉक्टर के पास नहीं… किसी पेड़ के पास चले जाना। वो सबसे अच्छी थेरेपी है। बिल्कुल प्री और सबसे असरदार। ‘प्रकृति की गोद में बैठो, सुकून खुद चलकर आएगा' इस आर्टिकल के लिए 3-4 लाइन का: प्रकृति सबसे बड़ी हीलर है। पेड़ हमारे सबसे व़फादार दोस्त हैं – जो बिना जज किए सब सुन लेते हैं। जब दुनिया समझे नहीं, तब पेड़ समझ जाते हैं। पेड़ों की छांव में बैठकर देखो, मन का बोझ अपने आप हल्का हो जाएगा। प्रकृति से जुड़ो, क्योंकि सुकून यहीं मिलता है।
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 20 जुलाई 2026 के अंक में पृष्ठ 10 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें




