इंदौर। शहर के व्यस्त व्यावसायिक क्षेत्रों में पार्किंग की समस्या नई नहीं है। वाहन बढ़ रहे हैं, सड़कें सीमित हैं और बाजारों में पार्किंग की जगह तलाशना रोजमर्रा की परेशानी बन चुका है। ऐसे में पालिका प्लाजा जैसे परिसर में पार्किंग व्यवस्था को व्यवस्थित करने के लिए शुल्क लेने का तर्क अपनी जगह है, लेकिन सवाल यह है कि जहां शासकीय दफ्तर संचालित होते हों, व्यवसायिक प्रतिष्ठान हों और निजी कार्यालयों में कर्मचारी रोजाना काम करने आते हों, वहां पार्किंग शुल्क की व्यवस्था कितनी न्यायसंगत है? पालिका प्लाजा केवल वाहनों को खड़ा करने की जगह नहीं, बल्कि विभिन्न कामों से आने वाले नागरिकों, व्यापारियों, कर्मचारियों और कार्यालय संचालकों की आवाजाही का केंद्र भी है। यहां कोई शासकीय काम से आता है, कोई अपने व्यवसाय के सिलसिले में और कोई नौकरी करने। ऐसे में कुछ समय के लिए आने वाले व्यक्ति और रोजाना आठ-दस घंटे वाहन खड़ा करने वाले कर्मचारी को एक ही नजरिए से देखना क्या उचित होगा?
व्यवस्था बनाना जरूरी, लेकिन बोझ किस पर? –
नगर निगम का तर्क हो सकता है कि पार्किंग स्थल के रखरखाव, सुरक्षा, सफाई और संचालन पर खर्च होता है। यदि किसी एजेंसी को निर्धारित प्रक्रिया के तहत पार्किंग संचालन का जिम्मा दिया जाता है, तो उसके खर्च की भरपाई के लिए शुल्क लेना भी व्यवस्था का हिस्सा हो सकता है। लेकिन इस तर्क के साथ यह सवाल भी जुड़ा है कि पार्किंग का वास्तविक खर्च कितना है, शुल्क किस आधार पर तय किया गया है और उससे वाहन मालिकों को कौन- सी सुविधाएं मिल रही हैं? पालिका प्लाजा के बेसमेंट और सतही पार्किंग के संचालन एवं रखरखाव के लिए नगर निगम की निविदा प्रक्रिया का सार्वजनिक रिकॉर्ड उपलब्ध है। इससे यह स्पष्ट है कि पार्किंग संचालन एक प्रशासनिक व्यवस्था के तहत किया जा रहा है। हालांकि, केवल निविदा जारी होने से हर प्रकार का शुल्क या हर श्रेणी के वाहन पर एक समान दर अपने आप न्यायसंगत साबित नहीं हो जाती। इसके लिए लागू शर्तों, स्वीकृत दरों और संबंधित नियमों को सामने रखना जरूरी है।
शासकीय परिसर में आने की भी कीमत? – सबसे
महत्वपूर्ण कर्मचारियों संचालकों का है, जिनका रोजाना पालिका प्लाजा आना मजबूरी है। यदि किसी व्यक्ति को अपने कार्यालय में काम करने के लिए प्रतिदिन वाहन पार्क करना पड़ता है, तो उससे हर दिन शुल्क वसूलना महीने के अंत तक एक अतिरिक्त आर्थिक बोझ बन सकता है। छोटे व्यवसायियों और सीमित वेतन पाने वाले कर्मचारियों के लिए यह खर्च मामूली नहीं माना जा सकता। दूसरी ओर, यह भी समझना होगा कि सार्वजनिक परिसर में पार्किंग की जगह असीमित नहीं है। यदि कोई वाहन पूरे दिन एक स्थान घेरे रखता है, तो दूसरे नागरिकों को पार्किंग की सुविधा मिलने में कठिनाई हो सकती है। इसलिए स्थायी कर्मचारियों के लिए अलग पास, मासिक रियायती दर और सीमित अवधि के लिए आने वाले नागरिकों के लिए अलग शुल्क जैसी श्रेणियों सवाल उन और कार्यालय पर विचार किया जा सकता है।
निगम बताए, शुल्क के बदले क्या सुविधा? – पार्किंग
शुल्क वसूलने वाली व्यवस्था की जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है। क्या हर वाहन को निर्धारित स्थान मिल रहा है? क्या सुरक्षा, रोशनी, साफ-सफाई और व्यवस्थित प्रवेश- निकास की सुविधा उपलब्ध है? क्या शुल्क की दरें स्पष्ट रूप से प्रदर्शित हैं? वाहन की सुरक्षा या किसी विवाद की स्थिति में जिम्मेदारी किसकी होगी? इन सवालों का जवाब देना नगर निगम और पार्किंग संचालन एजेंसी की जिम्मेदारी है। शुल्क वसूली की व्यवस्था पारदर्शी होनी चाहिए और नागरिकों को यह जानकारी मिलनी चाहिए कि उनसे किस नियम के तहत कितनी राशि ली जा रही है।
समाधान टकराव नहीं, व्यावहारिक नीति है- पालिका
प्लाजा में पार्किंग व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए शुल्क का विरोध या समर्थन ही एकमात्र विकल्प नहीं है। जरूरत ऐसी नीति की है, जिसमें शासकीय काम से आने वाले नागरिकों, अल्प अवधि के आगंतुकों, रोजाना आने वाले कर्मचारियों और व्यवसायिक प्रतिष्ठानों की जरूरतों में संतुलन हो। नगर निगम को लागू निविदा शर्तें और स्वीकृत दरें सार्वजनिक करनी चाहिए। नियमित कर्मचारियों और कार्यालय संचालकों के लिए मासिक पास अथवा रियायती व्यवस्था की व्यवहार्यता पर विचार करना चाहिए। साथ ही, पार्किंग शुल्क के बदले मिलने वाली सुविधाओं और संचालन की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। आखिरकार, शहर में पार्किंग व्यवस्था सुधारना जरूरी है, लेकिन व्यवस्था सुधारने के नाम पर नागरिकों पर अतिरिक्त बोझ डालने से पहले उसकी जरूरत, औचित्य और नियमों को स्पष्ट करना उससे भी ज्यादा जरूरी है। सवाल पार्किंग शुल्क लेने का ही नहीं, सवाल यह है कि शुल्क किस आधार पर, किससे और किस सुविधा के बदले लिया जा रहा है।
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 16 अक्टूबर 2026 के अंक में पृष्ठ 9 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें





