शहर में पानी की कमी के बीच अब भवन निर्माण में नर्मदा और भूजल के इस्तेमाल को कम करने की तैयारी है। नगर निगम रोजाना करीब 200 एमएलडी पानी ट्रीट करता है, लेकिन इसका बड़ा हिस्सा पेड़-पौधों, ग्रीन बेल्ट और बगीचों में उपयोग होने के बाद नदी-नालों में बह जाता है। फिलहाल निर्माण कार्यों में भी इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से निगम और सरकारी एजेंसियां ही कर रही हैं। अब निजी बिल्डरों और आम नागरिकों तक ट्रीटेड पानी पहुंचाने की योजना बनाई जा रही है। महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने अधिकारियों को इसकी गुणवत्ता सुधारने और आसान उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए 15 दिन में प्लान तैयार करने के निर्देश दिए हैं।
गुणवत्ता ठीक होगी तभी बढ़ेगा उपयोग
महापौर ने कहा कि ट्रीटेड पानी की गुणवत्ता की दोबारा जांच की जाए और इसे भवन निर्माण के योग्य बनाया जाए। निर्माण कार्यों में बड़ी मात्रा में पानी लगता है। ऐसे में यदि वैकल्पिक पानी उपलब्ध नहीं कराया गया, तो भूजल का दोहन बढ़ेगा और जल संकट के बीच निर्माण कार्य भी प्रभावित हो सकते हैं। इसके लिए एसटीपी संचालन करने वाली एजेंसियों की बैठक बुलाकर गुणवत्ता और उपलब्धता पर चर्चा की जाएगी।
टैंकरों से सप्लाई सबसे बड़ी चुनौती
ट्रीटेड पानी का इस्तेमाल बढ़ाने में सबसे बड़ी परेशानी इसके परिवहन की है। निगम में ट्रीटेड पानी की सप्लाई के लिए ठेकेदार आसानी से तैयार नहीं होते। इसकी वजह यह है कि ट्रीटेड पानी ढोने वाले टैंकरों का इस्तेमाल बाद में पीने के पानी की सप्लाई में नहीं किया जा सकता। साथ ही, पानी में मौजूद रसायनों के कारण टैंकरों के खराब होने की आशंका भी ठेकेदारों की चिंता है।
हाइड्रेंट पर पानी, लेकिन घर तक कैसे पहुंचे?
नगर निगम पहले भी ट्रीटेड पानी निशुल्क उपलब्ध कराने की बात कह चुका है। निगम आयुक्त क्षितिज सिंघल के अनुसार, हाइड्रेंट से कोई भी व्यक्ति निशुल्क ट्रीटेड पानी ले सकता है। लेकिन आम नागरिकों के पास पानी लाने के लिए टैंकर नहीं हैं। ऐसे में सिर्फ निशुल्क पानी उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। इसके परिवहन की व्यवस्था भी जरूरी है।
ये हैं पांच प्रमुख बातें
1. 200 एमएलडी ट्रीटेड पानी: रोजाना बड़ी मात्रा में पानी का शोधन, लेकिन निर्माण क्षेत्र में सीमित उपयोग।
2. 15 दिन में प्लान: गुणवत्ता सुधारने और उपलब्धता बढ़ाने की योजना तैयार होगी।
3. निजी निर्माण पर जोर: घर बनाने वाले नागरिकों और निजी बिल्डरों तक पानी पहुंचाने की तैयारी।
4. टैंकरों की समस्या: परिवहन के लिए अलग व्यवस्था नहीं होने से सप्लाई प्रभावित।
5. भूजल बचाने की कोशिश: निर्माण कार्यों में वैकल्पिक पानी मिलने से नर्मदा और बोरिंग के पानी पर निर्भरता घट सकती है।
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 12 अक्टूबर 2026 के अंक में पृष्ठ 8 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें




