सोमवार, 12 अक्टूबर 2026
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नेपाल में बाढ़ की तबाही ने फिर चेताया, हिमालय से छेड़छाड़ कितनी भारी पड़ेगी? य

प्रकृति हमें जल, वायु, भूमि, वन और जीवन के लिए आवश्यक अनेक संसाधन प्रदान करती है। मगर विकास और आधुनिक जीवन की दौड़ में मनुष्य ने प्रकृति के साथ संतुलन…

प्रकृति हमें जल, वायु, भूमि, वन और जीवन के लिए आवश्यक अनेक संसाधन प्रदान करती है। मगर विकास और आधुनिक जीवन की दौड़ में मनुष्य ने प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखने के बजाय उसका अंधाधुंध दोहन शुरू कर दिया है। तिब्बत से लगे नेपाल के रसुवा और आसपास के क्षेत्रों में बुधवार को आई बाढ़ से बड़े पैमाने पर हुए जान-माल के नुकसान ने सभी को झकझोर दिया है। इस त्रासदी में कई लोगों की जान चली गई, जबकि पांच सौ से ज्यादा लापता हैं, जिनमें सौ से अधिक भारतीय भी शामिल हैं। बाढ़ से कई पुल बह गए और कम से कम एक दर्जन जलविद्युत परियोजनाएं क्षतिग्रस्त हो गईं। प्रारंभिक अध्ययन रिपोर्टों और उपग्रह से ली गई तस्वीरों के विश्लेषण से पता चला है कि नेपाल-तिब्बत सीमा के पास पहाड़ी से चट्टानों के खिसकने के बाद बाढ़ आई। यानी यह हिमालय की संवेदनशीलता और उसकी पारिस्थितिकीय प्रकृति को समझने तथा विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने को लेकर एक गंभीर चेतावनी है। बाढ़ की खौफनाक तस्वीरों से यह समझना मुश्किल नहीं है कि जब प्रकृति अपना रौद्र रूप दिखाती है, तो मानव सभ्यता उसके आगे बेबस हो जाती है। प्रकृति और मनुष्य का संबंध अत्यंत गहरा एवं परस्पर निर्भरता पर आधारित है और जब इसमें कृत्रिम असंतुलन होता है, तो यह विनाशकारी घटनाओं का कारण बनता है। खबरों के मुताबिक, सबसे पहले भोटे कोशी नदी में अचानक बाढ़ आई, जिससे तिब्बत की सीमा से लगे नेपाल के रसुवा और धादिंग जिले प्रभावित हुए। पानी और मलबे का बहाव इतना तेज था कि आसपास के धादिंग, नुवाकोट और चितवन जिले भी इसकी चपेट में आ गए। बाढ़ से लापता भारतीयों में से ज्यादातर तिब्बत में कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए जा रहे थे। नेपाल के बाढ़ पूर्वानुमान प्रभाग के मुताबिक, पहाड़ी से चट्टानों एवं मिट्टी के खिसकने से नदी अवरुद्ध हो गई और वहां बनी झील के टूटने से भीषण बाढ़ आई। यह त्रासदी इस बात का संकेत है कि हिमालयी क्षेत्र पारिस्थितिकीय रूप से कितना संवेदनशील है। प्रकृति हमें जल, वायु, भूमि, वन और जीवन के लिए आवश्यक अनेक संसाधन प्रदान करती है। मगर विकास और आधुनिक जीवन की दौड़ में मनुष्य ने प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखने के बजाय उसका अंधाधुंध दोहन शुरू कर दिया है। जंगलों की कटाई, पहाड़ों का अतिक्रमण, नदियों के मार्गों में हस्तक्षेप और अनियोजित निर्माण जैसे कार्यों का परिणाम बाढ़ जैसी विनाशकारी त्रासदियों के रूप में सामने आ रहा है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिन नदियों को नेपाल की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा-संभावना की जीवनरेखा माना जाता है, उन्हीं के किनारे बेतरतीब बस्तियां, सड़कें और अन्य ढांचागत संरचनाएं तैयार कर दी गई हैं। विकास आवश्यक है, लेकिन इस क्रम में पहाड़ों की प्रकृति की अनदेखी अंततः जोखिम का विस्तार बन जाती है। जलवायु परिवर्तन ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। मौसम का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। कहीं लंबे समय तक सूखा पड़ता है, तो कहीं बहुत कम समय में अत्यधिक वर्षा या बादल फटने की घटनाएं बढ़ रही हैं। साफ है कि पर्यावरण के साथ छेड़छाड़ बाढ़ जैसी त्रासदी को जन्म देती है। बहरहाल, विदेश मंत्रालय का कहना है कि नेपाल में बाढ़ से प्रभावित भारतीय नागरिकों के बचाव और उन्हें राहत पहुंचाने के लिए वहां की सरकार के साथ लगातार संपर्क एवं समन्वय किया जा रहा है। मगर, इस बाढ़ से नेपाल के साथ लगते बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में भी खतरा मंडराने लगा है। केंद्र और राज्य सरकारों को चाहिए कि वहां एहतियाती तौर पर सुरक्षा के माकूल प्रबंध किए जाएं, ताकि किसी तरह के नुकसान से बचा जा सके।

यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 27 अगस्त 2026 के अंक में पृष्ठ 9 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें