नगर निगम सीमा के तेजी से विस्तार और शहर के 30 से 35 किलोमीटर तक फैल जाने के कारण अब व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के गुमास्ता लाइसेंस बनाने और नवीनीकरण की व्यवस्था में बदलाव की तैयारी है। निगम मुख्यालय से संचालित हो रही लाइसेंसिंग प्रक्रिया को एक बार फिर जोन कार्यालयों तक पहुंचाने पर विचार किया जा रहा है। इससे छोटे दुकानदारों को मुख्यालय के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे और निगम का अमला गली-मोहल्लों तक पहुंचकर बिना लाइसेंस चल रहे कारोबार की निगरानी कर सकेगा। राजस्व विभाग का मानना है कि वर्तमान व्यवस्था में मुख्यालय से लाइसेंस जारी होने के बावजूद बड़ी संख्या में छोटे-बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठान निगम के रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हैं। होटल, रेस्टोरेंट, भोजनालय, किराना सहित अन्य व्यवसाय संचालित हो रहे हैं, लेकिन उनके लाइसेंस नहीं बन पा रहे हैं। इससे निगम को राजस्व का नुकसान हो रहा है। नई व्यवस्था लागू होने पर नए लाइसेंस बनाने और पुराने लाइसेंस के नवीनीकरण की प्रक्रिया आसान होने की उम्मीद है।
मुख्यालय तक नहीं पहुंचते छोटे
कारोबारी- नगर निगम के अपर आयुक्त राजस्व आकाश सिंह के अनुसार वर्तमान में गुमास्ता लाइसेंस निगम मुख्यालय से जारी किए जाते हैं। बिल कलेक्टर और सहायक राजस्व अधिकारी (एआरओ) को फील्ड में दुकानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की जांच तथा लाइसेंस बनवाने और नवीनीकरण की प्रक्रिया में भूमिका दी गई है। इसके बावजूद शहर के विस्तार के कारण निगम का अमला हर क्षेत्र तक प्रभावी रूप से नहीं पहुंच पा रहा है। शहर के कई हिस्सों में छोटे दुकानदार मुख्यालय तक लाइसेंस बनवाने नहीं आते। ऐसे में उनका कारोबार चलता रहता है, लेकिन निगम के रिकॉर्ड में पंजीयन नहीं हो पाता। राजस्व विभाग इसी खामी को दूर करने के लिए लाइसेंसिंग प्रक्रिया को जोन स्तर पर लाने पर विचार कर रहा है।
जोनल अधिकारी को मिल सकती
है जिम्मेदारी- नई व्यवस्था लागू होती है तो सहायक राजस्व अधिकारी के बजाय जोनल अधिकारी को लाइसेंसिंग की जिम्मेदारी देने पर भी विचार किया जा रहा है। इसका उद्देश्य व्यवस्था में जवाबदेही तय करना और जोन स्तर पर सीधे मॉनिटरिंग करना है। प्रत्येक जोन में आने वाले व्यावसायिक प्रतिष्ठानों का रिकॉर्ड तैयार कर नए लाइसेंस और नवीनीकरण की प्रक्रिया स्थानीय स्तर पर की जा सकेगी। इससे निगम के पास शहर के छोटे से लेकर बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों का डेटाबेस भी तैयार होगा और जिन प्रतिष्ठानों के लाइसेंस नहीं हैं, उनकी पहचान कर राजस्व वसूली बढ़ाई जा सकेगी।
जोन कार्यालय से बनाए गए फर्जी
लाइसेंस – हालांकि निगम के सामने सबसे बड़ी चुनौती व्यवस्था में पारदर्शिता और निगरानी की होगी। इससे पहले भी जोन कार्यालयों से लाइसेंस जारी करने की व्यवस्था लागू की जा चुकी है। तत्कालीन राजस्व अपर आयुक्त एस. कृष्ण चैतन्य के कार्यकाल में जोन कार्यालयों को लाइसेंस बनाने की जिम्मेदारी दी गई थी। उस दौरान कुछ मामलों में नगर निगम के प्रमाण-पत्रों की तर्ज पर डुप्लीकेट और फर्जी लाइसेंस बनाए जाने के मामले सामने आए थे। इससे निगम को राजस्व नुकसान हुआ और बाद में लाइसेंस जारी करने की व्यवस्था फिर निगम मुख्यालय पर केंद्रीकृत कर दी गई। ऑनलाइन मॉनिटरिंग जरूरी
निगम यदि दोबारा लाइसेंसिंग व्यवस्था जोन स्तर पर लागू करता है तो मुख्यालय से इसकी ऑनलाइन मॉनिटरिंग जरूरी होगी। हर लाइसेंस का ऑनलाइन रिकॉर्ड, आवेदन से लेकर स्वीकृति तक की पूरी प्रक्रिया और जारी प्रमाण-पत्र का डिजिटल सत्यापन अनिवार्य किया जाना चाहिए। इससे फर्जी लाइसेंस की संभावना कम होगी और किसी भी जोन में जारी लाइसेंस की जानकारी मुख्यालय स्तर पर तत्काल उपलब्ध रहेगी।
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 26 अगस्त 2026 के अंक में पृष्ठ 5 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें




