सोमवार, 12 अक्टूबर 2026
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करोड़ों का टैक्स देने वाले बाजार लावारिस, जाम में दम तोड़ता कारोबार!

ट्रैफिक पुलिस के पास जवान नहीं, थाने के पास बल नहीं, क्रेन भी पर्याप्त नहीं; फिर अव्यवस्था से जूझते व्यापारी और राहगीर जाएं तो जाएं कहां? — अक्षय जैन टैक्स पूरा, सुविधा अधूरी क्यों?

इंदौर के व्यस्त बाजार सरकार के खजाने में करोड़ों रुपए का टैक्स जमा करते हैं, हजारों परिवारों की रोजी-रोटी चलाते हैं और शहर की अर्थव्यवस्था को गति देते हैं। लेकिन उन्हीं बाजारों में यातायात व्यवस्था का हाल ऐसा है, मानो उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया गया हो। सड़क पर अवैध पार्किंग, ऑटो-ई-रिक्शा की बेतरतीब आवाजाही, पार्किंग को लेकर विवाद और जाम के बीच फंसे ग्राहक। सवाल है जिस बाजार से सरकार को राजस्व चाहिए, उस बाजार तक पहुंचने का रास्ता सुगम बनाने की जिम्मेदारी किसकी है? राजबाड़ा और पुराने शहर के प्रमुख व्यापारिक क्षेत्रों में ग्राहक को दुकान तक पहुंचने से पहले ही जाम, पार्किंग और अव्यवस्था से जूझना पड़े, तो बाजार की रौनक कैसे कायम रहेगी? व्यापारी दुकान खोलकर बैठा है, माल उपलब्ध है, टैक्स चुका रहा है, लेकिन ग्राहक रास्ते की परेशानी से बचने के लिए बाजार आने से कतराए तो नुकसान किसका होगा?

व्यापारी कारोबार संभाले या जाम से जूझे?

व्यापारी पहले ही बढ़ती लागत, प्रतिस्पर्धा और घटते मुनाफे जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। ऊपर से अव्यवस्थित यातायात उसके व्यावसायिक तनाव को बढ़ा रहा है। ग्राहक को वाहन खड़ा करने की जगह नहीं मिलती, मालवाहक वाहन रास्ता रोकते हैं और बेतरतीब खड़े ऑटो-ई-रिक्शा सड़क की बची- खुची जगह भी घेर लेते हैं। नतीजा ग्राहक परेशान, राहगीर हलकान और व्यापारी बेबस। जब बाजार तक पहुंचना ही मुश्किल हो जाए, तो कारोबार बढ़ाने की उम्मीद कैसे की जाए?

हर विभाग के पास बहाना, समाधान किसके पास?

यातायात पुलिस से पूछिए तो पर्याप्त जवान और संसाधन

जाम केवल परेशानी नहीं सुरक्षा का सवाल भी

व्यस्त बाजारों में अव्यवस्थित यातायात केवल समय बर्बाद नहीं करता, बल्कि आपातकालीन वाहनों के रास्ते में बाधा और पैदल यात्रियों के लिए दुर्घटना का जोखिम भी बढ़ा सकता है। सड़क पर कब्जे और बेतरतीब पार्किंग के बीच राहगीर अपनी जगह तलाशता है। कई बार उसे मजबूरी में चलते वाहनों के बीच से निकलना पड़ता है। क्या किसी बड़ी दुर्घटना के बाद ही व्यवस्था की कमियां दूर की जाएंगी? क्या बाजारों की सड़कों को सुचारु रखना प्रशासन की नियमित जिम्मेदारी नहीं है?

नहीं होने की बात सामने आती अतिरिक्त बल की व्यवस्था है। स्थानीय थाना पुलिस बल कौन करेगा? क्रेन कम हैं तो की कमी बताता है। पश्चिम क्षेत्र संसाधन कौन बढ़ाएगा? में क्रेन की सीमित उपलब्धता अवैध पार्किंग पर कार्रवाई जैसी समस्या भी कार्रवाई को कौन करेगा? ऑटो-ई- प्रभावित कर सकती है।

रिक्शा के लिए निर्धारित लेकिन आम आदमी इन ठहराव स्थल कौन बनाएगा? कमियों का जिम्मेदार नहीं है।

व्यवस्था की कमी का उसे यह जानने में दिलचस्पी खामियाजा हर दिन जनता नहीं कि किस विभाग के पास भुगते और जिम्मेदारी तय कितने जवान हैं; उसे तो करने के समय हर विभाग सड़क पर व्यवस्था चाहिए।

अपनी मजबूरी गिनाए यह यदि जवान कम हैं तो सिलसिला कब तक चलेगा?

चालान से आगे बढ़कर व्यवस्था बनानी होगी

समाधान के लिए किसी बड़ी परियोजना की नहीं, मजबूत इच्छाशक्ति और स्पष्ट जिम्मेदारी की जरूरत है। प्रमुख बाजारों में जाम वाले स्थान चिह्नित हों। अवैध पार्किंग पर नियमित कार्रवाई हो। ऑटो-ई- रिक्शा के लिए तय स्टॉप बनाए जाएं। माल लोडिंग-अनलोडिंग का समय निर्धारित हो। पर्याप्त क्रेन और प्रवर्तन दल उपलब्ध कराए जाएं। यातायात पुलिस, स्थानीय थाना, नगर निगम और व्यापारी संगठनों की संयुक्त निगरानी व्यवस्था बने।

साथ ही, हर बाजार के लिए जिम्मेदार अधिकारी और शिकायतों के निराकरण की समय-सीमा तय हो। व्यवस्था का आकलन केवल चालानों की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से हो कि जाम कितना घटा और ग्राहक की पहुंच कितनी आसान हुई। इंदौर की पहचान केवल स्वच्छता या विकास परियोजनाओं से नहीं बनती। उसकी पहचान इस बात से भी बनती है कि आम नागरिक अपने शहर में कितनी आसानी से चल सकता है और व्यापारी बिना अनावश्यक अव्यवस्था के कारोबार कर सकता है। व्यापारियों से टैक्स और नियमों के पालन की अपेक्षा बिल्कुल उचित है। लेकिन प्रशासन से सुगम यातायात, सुरक्षित सड़क और प्रभावी व्यवस्था की अपेक्षा भी उतनी ही जायज है। बाजार सरकार के लिए राजस्व का स्रोत हैं, किसी विभाग की उपेक्षा के हवाले करने की जगह नहीं। अब जरूरत आश्वासनों की नहीं, जवाबदेही की है। इंदौर के व्यस्त बाजारों में यातायात व्यवस्था सुधारने की जिम्मेदारी कौन लेगा? संसाधनों की कमी दूर करने की पहल कब होगी? और सबसे अहम आम नागरिक को राहत कब मिलेगी? क्योंकि बाजार में जाम सिर्फ सड़क पर नहीं लगता, उसका असर व्यापार, रोजगार और शहर की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है।

यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 9 अक्टूबर 2026 के अंक में पृष्ठ 8 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें

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सिटी ब्लास्ट, 9 अक्टूबर 2026, पृष्ठ 8