शहर में लगातार गीले कचरे की मात्रा बढ़ रही है और इसके निपटान के लिए जहां स्वास्थ्य समिति के प्रभारी आश्विन शुक्ल नए दो बायो सीएनजी प्लांट लगाने के लिए जमीन की तलाश करने की बात कह रहे हैं वही दूसरी और वर्तमान में जो बायो सीएनजी प्लांट टीचिंग ग्राउंड पर संचालित किया जा रहा है उसके क्षमता 800 टन प्रतिदिन गीले कचरे के निपटान हेतु वर्तमान प्लांट को विस्तार दिया जाना है लेकिन फिलहाल मामला खटाई में पड़ता दिखाई दे रहा है। नगर निगम और प्लांट प्रबंधन के बीच में जमीन की शर्तों को लेकर उलझन फिलहाल बनी हुई है इसी के चलते या मामला अब ठंडा बस्ता में जा सकता है। फिलहाल आगामी 13 अगस्त 2026 को होने वाली महापौर परिषद की बैठक में इस पर बहस और चर्चा होगी क्योंकि शर्तों को लेकर सभी एमआईसी सदस्यों में एकमतता नहीं है। सूत्रों के मुताबिक वर्तमान बायोगैस संयंत्र प्रबंधन करने वाली कंपनी और निगम के बीच जमीन देने के बीच चल रही बातचीत किसी नतीजे पर नहीं पहुंची है। नगर निगम द्वारा जमीन के बदले रॉयल्टी में वृद्धि की गई है इस वृद्धि को लेकर बायो सीएनजी प्लांट ने आपत्ति ली है और वह राशि बढ़ाने पर सहमत नहीं है। इसीलिए यह मामला उलझा हुआ है। इधर प्रबंधन की ओर से भी स्पष्ट किया गया है कि वह अधिक राशि चुकाने में सक्षम नहीं है क्योंकि प्लांट संचालित करने का खर्च नहीं निकल पा रहा है इस समय नया निवेश ब़ढ़ी हुई रॉयल्टी पर करना मुश्किल है। नगर निगम के एमआईसी सदस्यों का सोचना है कि वह कौड़ियों के दाम पर जमीन नहीं दे सकते। पूरे शहर का गीला कचरा प्लांट को दिया जा रहा है जिससे बायो- सीएनजी गैस तैयार की जाती है इस गैस से संयंत्र संचालक बिजनेस कर रहे हैं। इसीलिए नगर निगम को अधिक आर्थिक लाभ होना चाहिए ताकि आम नागरिकों को र्भी इसका लाभ मिल सके हालांकि टैक्स सहित अन्य किसी में नगर निगम द्वारा कोई बड़ी छूट नहीं दी जा रही है बल्कि टैक्स को अलग-अलग स्लिप में लगाकर हर साल टैक्स बढ़ाने का काम किया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर वेस्ट प्रबंधन से जुड़े जानकारों का कहना है कि इंदौर के पास एशिया का दूसरा सबसे बड़ा गीला कचरा प्रबंधन प्लांट लगा हुआ है यह अपने आप में ही एक बड़ी उपलब्धि है क्योंकि प्लांट से भले ही रेवेन्यू नहीं मिले लेकिन इंदौर शहर के पास गीले कचरे को रिसाइकल करने का बड़ा संसाधन मौजूद है। अगर वर्तमान लगे हुए बायो सीएनजी गैस प्लांट को विस्तार दिया जाता है तो नगर निगम का इसमें कोई नुकसान नहीं है क्योंकि देश में ऐसे कई शहर हैं जिनके पास इतनी बड़ी यूनिट खुद के शहर में नहीं है जिसके कारण वह गीले कचरे के प्रबंधन एवं निस्तारण में पीछे रह जाते हैं इसीलिए इंदौर के कॉर्पोरेट इस बात का ध्यान रखें कि नए प्लांट अलग-अलग स्थान पर लगाने के बजाय वर्तमान में चल रही यूनिट को विस्तार दिया जाए। इसके अलावा नई एजेंसी को प्लांट लगाने के लिए नियुक्त करने पर वर्तमान की समस्या का निराकरण नहीं होगा
फाइनल करने और संयंत्र स्थापित करने में 2 से 3 साल का समय लगेगा इस दौरान कचरे की मात्रा 800 टन प्रतिदिन से अधिक हो जाएगी ऐसी स्थिति में कचरे का निपटान एक बड़ी समस्या बनकर इंदौर शहर में उभरने लगेगा।
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 11 अगस्त 2026 के अंक में पृष्ठ 8 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें




