ल ही में आय आयटी के छात्र के आत्म हत्या के मामले में छात्रों द्वारा प्रोफसर दुल्ला पर जातिगत प्रताड़ना के आरोप लगा कर आंदोलन किया जा रहा है। छात्रों का एवं उसके परिवार का आरोप है कि छात्र एससीएसटी दलित समाज का होने के कारण उसे प्रताड़ित किया गया था, जबकि प्ऱोफेसर दुल्ला का कथन है कि उन्होंने छात्र को चेट जीपीटी पर प्रश्न पत्र लोड कर चेट जीपीटी से नकल करने से रोकने का प्रयास किया था और यह प्रयास उनकी शैक्षणिक ड्यूटी में आता है। नकल से रोकने के बाद उसे कॉन्सलिंग कर समझाइश भी दी गई। उधर प्रोफेसर के समर्थन में आईआईटी के प्रोफेसर भी उतर आए हैं, और वे प्रोफेसर को निर्दोष मान कर उनके विरुद्ध किसी भी कार्यवाही का विरोध कर रहे है। देखा जाए तो यह मामला आईआईटी जैसे उच्च शिक्षा संस्थान में नकल रोकने से सम्बंधित है। एक शिक्षक की यह ड्यूटी है कि वह निष्पक्ष परीक्षा का संचालन कराने में अपनी ड्यूटी निभाए। यह भी अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस मामले में छात्र ने अपनी जीवनलीला समाप्त कर हमारी शिक्षा व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया। हमारी शिक्षा व्यवस्था ने छात्रों को मानसिक रूप से इतना कमजोर कर दिया है कि छोटी छोटी बात पर वे जान से खेल जाते हैं, उनकी सहन शीलता शून्य हो गई हैं। आज की शिक्षा हमे शिक्षित तो बनाती है लेकिन संस्कार और सहनशीलता नहीं सिखाती आज छात्र उन्हीं शिक्षक के खिलाफ आंदोलन रत है जो उनका भविष्य बनाने के लिये कठिन परिश्रम करते हैं और शिक्षक जिन पर आंदोलन को चर्चा या बातचीत से आंदोलन को समाप्त कराने की जिम्मेदारी है वे खुद आंदोलन पर उतर आये छात्रों एवं शिक्षकों का यह टकराव कहा जाकर रुकेगा समझ से परे है। आज प्रोफेसर को निलंबित कर दिया गया क्या निलंबन इस समस्या का हल है क्या निलंबन से छात्र की जान वापस आ सकती हैं, निलंबन से केवल छात्रों का आंदोलन समाप्त हो सकता हैं, समस्याओं का हल नही हो सकता। समस्या का हल तो यह है कि छात्रों को उन्हें मानसिक रूप से सुदृढ़ बनाया जाए, वर्ष भर में प्राप्त शिक्षा का 3 घण्टे में मूल्याकन करने की पद्धति में परिवर्तन किया जाए, परीक्षा के समय शिक्षकों का खौफ खत्म किया जावे, शिक्षकों की मानसिक प्रताड़ना से बचने के लिए कैमरे से निगरानी को बढावा दिया जावे। क्या कि छात्र को इतना प्रताड़ित किया गया कि उसने अपना जीवन समाप्त करने का निर्णय ले लिया यह स्थिति कितनी भयावह हैं छात्र का परिवार यह दर्द जीवन भर कैसे सहन कर पायेगा। इसकी कल्पना से मन काँप उठता है। भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सख्त कदम उठाए जाने जरूरी हैं युवावस्था में परिवार के एक सदस्य का दुनिया से बिदा होने का दर्द वह परिवार ही समझ सकता हैं जिसने यह दर्दनाक हादसे का सामना किया है।
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 23 सितम्बर 2026 के अंक में पृष्ठ 9 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें




