नगर निगम के फर्जी नामांतरण घोटाले की जांच अब निर्णायक दौर में पहुंच गई है। जांच पूरी होने के बाद पुलिस आज आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर सकती है। जांच में अब तक 20 से अधिक दलालों और निगम के आउटसोर्स कर्मचारियों के संपर्क सामने आने की बात कही जा रही है। पुलिस की गहराई से जांच शुरू होने के बाद इस पूरे नेटवर्क की परत-दर-परत जानकारी सामने आने की संभावना है।
एक नामांतरण के लिए 2-3 लाख तक का खेल
जांच से जुड़े सूत्रों के अनुसार फर्जी नामांतरण कराने के लिए ऑपरेटरों को एक से तीन लाख रुपए तक की रिश्वत दिए जाने की जानकारी सामने आई है। दलाल न केवल नामांतरण कराने में सक्रिय थे, बल्कि संपत्तियों की खरीद-बिक्री में भी उनकी भूमिका बताई जा रही है। इनमें से कई दलाल रजिस्ट्रार कार्यालय के आसपास भी सक्रिय रहते थे।
निगम कर्मचारियों से संपर्क के सुराग
नगर निगम सूत्रों के अनुसार रियाज अंसारी, संजय यादव, सौरभ तिवारी, संतोष मालवीय, अजय सोलंकी, सागर पवार और तरुण जोशी समेत जिन कर्मचारियों पर पहले निलंबन, बर्खास्तगी या एफआईआर जैसी कार्रवाई हुई, उनके संपर्क भी इन दलालों से होने की जानकारी जांच में सामने आई है। हालांकि इन सभी की भूमिका का अंतिम निर्धारण पुलिस जांच के बाद ही होगा।
भोपाल से मिला 100 जीबी डेटा
घोटाले की जांच को आगे बढ़ाने में भोपाल स्थित ई-पालिका कार्यालय से मिला करीब 100 जीबी डेटा महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जांच समिति ने साइबर जांच और पीड़ितों से पूछताछ के आधार पर नामांतरण की प्रक्रिया और उससे जुड़े लोगों की जानकारी जुटाई। समिति सदस्य अर्थ जैन के अनुसार ई-पालिका पोर्टल के रिकॉर्ड से फर्जी नामांतरण तक पहुंचने में मदद मिली। अपर आयुक्त आकाश सिंह ने करीब 50 पीड़ितों से वन-टू-वन चर्चा कर यह जानने का प्रयास किया कि उन्होंने दस्तावेज किसे दिए और नामांतरण की प्रक्रिया कैसे हुई।
आईडी से हुआ फर्जीवाड़ा
जांच में उपायुक्त एसके सगर और प्रदीप जैन की आईडी से फर्जी नामांतरण किए जाने की जानकारी सामने आई है। एसके सगर का विभाग बदला जा चुका है। फिलहाल जांच में किसी बड़े अधिकारी की प्रत्यक्ष भूमिका सामने नहीं आई है। विशेषज्ञों की राय- छोटी सैलरी वाले कर्मचारियों को बड़ी जिम्मेदारी से बचाना होगा। निगम में स्थायी कर्मचारियों के सेवानिवृत्त होने के बाद मस्टर और आउटसोर्स कर्मचारियों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी जा रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि संवेदनशील आईडी, नामांतरण और संपत्ति रिकॉर्ड जैसे कामों में जवाबदेही तय करने के साथ पर्याप्त निगरानी जरूरी है।
आज खुल सकते हैं कई और नाम
पुलिस की विस्तृत जांच के बाद दलालों, आउटसोर्स कर्मचारियों और अन्य संभावित सहयोगियों की भूमिका स्पष्ट होने की उम्मीद है। जांच एजेंसियां डिजिटल रिकॉर्ड, नामांतरण दस्तावेज और पीड़ितों के बयान को जोड़कर पूरे नेटवर्क तक पहुंचने की कोशिश कर रही हैं। 1. 20 से अधिक दलाल जांच के दायरे में। 2. ऑपरेटरों को 1 से 3 लाख रुपए तक रिश्वत दिए जाने का दावा।
3. भोपाल से मिला 100 जीबी डेटा बना अहम सुराग।
4. करीब 50 पीड़ितों से वन-टू-वन पूछताछ 5. आज एफआईआर के बाद सामने आ सकती है घोटाले की नई कहानी।
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 18 अगस्त 2026 के अंक में पृष्ठ 8 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें




