मोटरसाइकिल को टक्कर जानबूझकर नहीं मारी गई, बल्कि यह एक हादसा था। किसी महिला का वाहन चलाते समय पीछा करने, रास्ता रोकने या टक्कर मारने के बाद मौके से फरार हो जाना आपराधिक मानसिकता को दर्शाता है। दिल्ली-एनसीआर में आपराधिक घटनाओं पर अंकुश लगाने के सरकार के दावे खोखले साबित हो रहे हैं। खासकर महिलाओं की सुरक्षा को लेकर हर स्तर पर गंभीरता और संवेदनशीलता का अभाव साफ नजर आता है। गुरुग्राम में हाल ही में एक मोटरसाइकिल सवार युवती को कार से टक्कर मारकर घायल कर देने की घटना ने सड़क पर सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस ने इस मामले में आरोपी कार चालक समेत दो लोगों को गिरफ्तार किया है। पीड़ित युवती का आरोप है कि कार में सवार लोगों ने पहले उसे रुकने का इशारा किया और बाद में उसकी मोटरसाइकिल को टक्कर मार दी। हालांकि, आरोपों की सच्चाई जांच के बाद ही सामने आएगी, लेकिन इससे सुरक्षा एजेंसियों की कार्यप्रणाली और सतर्कता पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। जब सड़क पर खुलेआम महिलाओं के साथ इस तरह की घटनाएं हों, तो जाहिर है कि अपराधियों के भीतर कानून का कोई खौफ नहीं है। दरअसल, पीड़ित युवती ने सोशल मीडिया पर इस घटना के वीडियो जारी कर आरोपी के उन दावों पर सवाल उठाए हैं कि मोटरसाइकिल को टक्कर जानबूझकर नहीं मारी गई, बल्कि यह एक हादसा था। यह घटना सड़क पर महिलाओं की सुरक्षा को लेकर वास्तविक स्थिति की ओर ध्यान खींचती है। किसी महिला का वाहन चलाते समय पीछा करने, रास्ता रोकने या टक्कर मारने के बाद मौके से फरार हो जाना आपराधिक मानसिकता को दर्शाता है। अगर आज भी महिलाएं निर्भीक होकर सड़क पर न चल सकें, तो यह शासन-प्रशासन के लिए गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए। सवाल यह भी है कि आखिर अपराधियों के भीतर कानून का खौफ क्यों नजर नहीं आता है? जाहिर है, इसके लिए निश्चित रूप से कानून प्रवर्तन एजेंसियों की लापरवाही जिम्मेदार है। जब तक पुलिस तंत्र में संबंधित कर्मचारियों और अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं की जाएगी, तब तक व्यवस्था में सुधार नहीं हो पाएगा। कहने को सरकार की ओर से सुरक्षा एजेंसियों को आधुनिक तकनीक से जोड़ा जा रहा है, लेकिन जब कोई आपराधिक घटना होती है, तो जमीनी स्तर पर इसके कोई प्रभावी नतीजे सामने नहीं आते हैं।
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 16 सितम्बर 2026 के अंक में पृष्ठ 8 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें




