अक्षय जैन। इंदौर त्योहारों का मौसम है। बाजारों में ग्राहकों की भीड़ होनी चाहिए, दुकानों पर रौनक और घरों में खुशियों की रोशनी। लेकिन बिजली की आंख- मिचौली ने पूरे उत्सवी माहौल पर पानी फेर दिया है। एक तरफ मौसम की तपिश आमजन को बेहाल कर रही है, दूसरी तरफ बिजली कटौती ने लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। पंखे-कूलर बंद होते ही घरों में बेचैनी और बाजारों में बिजली गुल होते ही कारोबार की रफ्तार पर ब्रेक लग जाता है। सवाल सीधा है जब त्योहार और बढ़ती बिजली की मांग पहले से तय हैं, तो विद्युत विभाग की तैयारियां आखिर कहां हैं?
बिजली गुल, व्यापारी की उम्मीदों पर अंधेरा त्योहारी सीजन व्यापारियों के लिए कमाई का अहम समय होता है। दुकानदार महीनों पहले से माल जुटाते हैं, सजावट करते हैं और ग्राहकों के स्वागत की तैयारी में जुटते हैं। लेकिन ऐन वक्त पर बिजली चली जाए तो सारी तैयारी धरी रह जाती है। रोशनी के अभाव में ग्राहक खरीदारी से कतराते हैं, गर्मी में दुकान पर रुकना मुश्किल होता है और बिजली से चलने वाले उपकरण ठप पड़ जाते हैं। ग्राहक दूसरी दुकान की ओर बढ़ जाता है और व्यापारी हाथ मलता रह जाता है। त्योहार पर बिक्री बढ़ने की उम्मीद थी, लेकिन बिजली कटौती ने व्यापारियों की चिंता बढ़ा दी। दुकान का किराया, कर्मचारियों का वेतन और अन्य खर्च अपनी जगह हैं। नुकसान की भरपाई कौन करेगा? बिजली विभाग तो कटौती कर आगे बढ़ जाता है, लेकिन उसका खामियाजा आम नागरिक और व्यापारी भुगतते हैं।
गर्मी में कटौती, जनता करे तो क्या करे? दिन हो या रात, बिजली की अनियमित आपूर्ति ने आमजन की परेशानी बढ़ा दी है। घरों में पंखे-कूलर बंद होने से बच्चों, बुजुर्गों और बीमार लोगों को सबसे ज्यादा परेशानी होती है। उमस और गर्मी के बीच बिजली का इंतजार करना किसी सजा से कम नहीं। त्योहार की तैयारियों के बीच घरेलू काम प्रभावित होते हैं और लोगों का गुस्सा बढ़ता जाता है। बिजली कटौती यदि तकनीकी खराबी के कारण है, तो सवाल यह है कि समय रहते व्यवस्था दुरुस्त क्यों नहीं की गई? यदि रखरखाव के लिए कटौती जरूरी है, तो उपभोक्ताओं को पूर्व सूचना क्यों नहीं दी जाती? आखिर हर बार परेशानी जनता ही क्यों झेले?
मांग का पता था, फिर इंतजाम क्यों नहीं?
त्योहार हर साल आते हैं। गर्मी में बिजली की मांग बढ़ना भी कोई नई बात नहीं। ऐसे में ट्रांसफॉर्मर, लाइन और वितरण व्यवस्था की जांच पहले ही होनी चाहिए। जरूरत के अनुसार मरम्मत दल तैनात रहने चाहिए, ताकि खराबी आते ही आपूर्ति बहाल की जा सके। लेकिन जब बार-बार बिजली गुल होने की शिकायतें सामने आती हैं, तो विभाग की तैयारियों और जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है। बिजली विभाग की जिम्मेदारी केवल बिल वसूलना नहीं, उपभोक्ताओं को भरोसेमंद आपूर्ति देना भी है। कटौती का कारण बताना, बहाली का समय स्पष्ट करना और शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई करना न्यूनतम अपेक्षा है। जनता को अंधेरे में रखकर व्यवस्था की खामियों पर पर्दा नहीं डाला जा सकता।
त्योहार में राहत चाहिए, बहाने नहीं
अब जरूरत समीक्षा बैठकों और औपचारिक आश्वासनों की नहीं, जमीन पर सुधार की है। बाजारों और रिहायशी क्षेत्रों में आपूर्ति की निगरानी हो, बार-बार खराब होने वाली लाइनों की मरम्मत की जाए और शिकायतों के त्वरित निराकरण की व्यवस्था बने। यदि कटौती अपरिहार्य है, तो उसकी सूचना पहले दी जाए, ताकि नागरिक और व्यापारी अपना काम व्यवस्थित कर सकें। त्योहार जनता के हैं, बाजार व्यापारियों के हैं और बिजली व्यवस्था विभाग की जिम्मेदारी है। नागरिक बिल समय पर चुकाएं, व्यापारी कारोबार चलाने के लिए खर्च उठाएं, लेकिन बदले में उन्हें अनिश्चितता और परेशानी ही मिले यह व्यवस्था कैसे स्वीकार्य हो सकती है? त्योहारों की रौनक बिजली से है, बिजली की मनमानी से नहीं। अब विद्युत विभाग को तय करना होगा कि वह जनता को निर्बाध आपूर्ति देने के लिए तैयार है या हर त्योहार पर नागरिकों और व्यापारियों को इसी अव्यवस्था के भरोसे छोड़ देगा।
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 12 अक्टूबर 2026 के अंक में पृष्ठ 5 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें




