प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता एडवोकेट प्रमोद द्विवेदी ने मीडिया से चर्चा में आरोप लगाया कि निगम वरिष्ठ अधिकारी सूचना प्रोद्योगिकी नियम 2015 का प्रावधान अधिकारी ने क्यों नहीं अवलोकित किया? डिजिटल हस्ताक्षर दोनो उपायुक्त के अन्य द्वारा किये गये तो उन पर कौन सी अपराधिक धाराओं में प्रकरण दर्ज करवाए गये। उपायुक्त पर लापरवाही बरतने पर क्या कार्यवाही हुई? 51 से अधिक रजिस्ट्री हुई उस पर विभाग एवं शासन क्या कार्यवाही कर रहा है? शासन द्वारा स्टाम्प ड्याूटी माफ हो, इन पीड़ित पक्षों की इस हेतु क्यों कोई पहल नहीं की जा रही है? दोषी व्यक्तियों के खिलाफ पुलिस में आपराधिक प्रकरण दर्ज क्यों नहीं किया जा रहा है? द्विवेदी ने सवाल उठाया कि, क्या नगर निगम की संपत्तिकर रसीद एवं नामान्तरण दाखले से स्वत्व प्रमाणित होता है? क्या स्वत्व का प्रमाण है तो फिर नगर निगम विधान ख़त्म हो तथा सम्पत्तिकर रसीद एवं दाखले पर जो नगर निगम विधान की धारा 167 का उल्लेख होता है, जिसमें यह बताया जाता है कि स्वत्व प्रमाण नहीं है। द्विवेदी ने सवाल उठाया कि कॉलोनी अवैध है तो फिर कार्यवाही क्यूँ नहीं? अवेध कॉलोनीयों में निर्माण कैसे, अवैध कॉलोनीयों कैसे बसी? 1999 से भाजपा परिषद, 2003 से भाजपा सरकार सवाल कितने कॉलोनाइजरों के खिलाफ कार्यवाही हुई? सबसे अहम सवाल रजिस्ट्री से आय होती है नगर निगम को 3 प्रतिशत स्टाम्प ड्याूटी आय मिलती है तो म.प्र. सरकार को स्टाम्प ड्याूटी, पंजीयन शुल्क, उपकर एवं पंचायत कर भी, तो क्या सब एक अधिकारी के तुगलकी फरमान से रोका जाए? सरकार गाईड लाईन हर वर्ष राजस्व वृद्धि खातिर बढाती है, स्टाम्प ड्याूटी भी बढाई गई तर्क था विकास कार्य खातिर धन मिलेगा तो क्या रजिस्ट्री रोकने से धन मिलेगा। गौरतलब रहे कि, फर्जी नामांतरण घोटाला प्रमोद द्विवेदी द्वारा ही उजागर किया गया था।
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 20 अगस्त 2026 के अंक में पृष्ठ 3 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें




