वाल है कि वहां के कुछ विद्यार्थियों ने अगर किसी मसले पर अपनी असहमति जाहिर की थी, तो क्या यह उनकी अभिव्यक्ति की आजादी और अधिकार के तहत नहीं आता है। इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि अदालत में कानून के आधार पर पैरोकारी करने से जुड़ा कोई संगठन ही या तो अपने अधिकारों का बेजा इस्तेमाल करने की कोशिश करे और अपनी सीमा का अतिक्रमण करे। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में स्पष्ट व्यवस्था दी है कि अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन करके कोई भी संस्था ऐसा आदेश पारित नहीं कर सकती, जिससे किसी का भविष्य बाधित हो।
गौरतलब है कि हैदराबाद स्थित नालसार विधि विश्वविद्यालय के छात्रों के खिलाफ बार काउंसिल आफ इंडिया यानी बीसीआइ के अध्यक्ष ने कुछ समय पहले एक आदेश जारी कर दिया था कि वहां पढ़ने वाले पूरे बैच के विद्यार्थियों का वकील के रूप में नामांकन किसी भी राज्य के बार काउंसिल में न किया जाए। उसके बाद इस मसले पर काफी विवाद उठा था कि क्या सिर्फ इसलिए विद्यार्थियों के भविष्य या करिअर को बाधित क्या जा सकता है कि उन्होंने किसी कार्यक्रम में प्रधान न्यायाधीश के आने पर आपत्ति जताई थी। हालांकि इस विवाद के तूल पकड़ने के बाद बीसीआइ के अध्यक्ष ने वह आदेश वापस ले लिया था, लेकिन यह सवाल अपनी जगह कायम रहा कि क्या उसके पास विद्यार्थियों के खिलाफ ऐसा आदेश जारी करने का अधिकार है। इसी मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि बीसीआइ के पास विधि के छात्रों के आचरण को नियंत्रित करने की वैधानिक शक्ति नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि विद्यार्थियों के संबंध में किसी भी तरह की कार्रवाई करना उस संस्थान का विषय है। संस्थान अपने नियमों और विनियमों के मुताबिक इस पर फैसला ले सकता है। मगर हैरानी की बात यह है कि एक ऐसे मामले में बीसीआइ ने अतिरिक्त सजगता दिखाते हुए नालसार विधि विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के खिलाफ फरमान जारी कर दिया था, जिससे उसका कोई सीधा वास्ता नहीं था। सवाल है कि वहां के कुछ विद्यार्थियों ने अगर किसी मसले पर अपनी असहमति जाहिर की थी, तो क्या यह उनकी अभिव्यक्ति की आजादी और अधिकार के तहत नहीं आता है। सिर्फ इसके लिए समूचे बैच के खिलाफ आदेश जारी कर देने की हड़बड़ी के पीछे आखिर कौन-सी मानसिकता काम कर रही थी? क्या बीसीआइ को इस बात का अंदाजा नहीं था कि अगर यह मामला अदालत में जाएगा, तो तर्कों और कानूनों की कसौटी पर उसे कैसे देखा जाएगा? यह विचित्र है कि बीसीआइ खुद कानून के पेशे को विनियमित करने वाली एक संवैधानिक संस्था है और इसके बावजूद उसे नियम-कायदों का पालन या अन्य तकाजों का ध्यान रखना जरूरी नहीं लगा। यों भी, बीसीआइ सिर्फ उन्हीं को विनियमित कर सकती है, जो वकील के रूप में नामांकित हो चुके हों। कानून के छात्रों की किसी गतिविधि पर कोई आदेश जारी करना उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं है। मगर यह समझना मुश्किल है कि कानून के पेशे के दायरे में काम करने वाली किसी संस्था ने किस प्रावधान के तहत विद्यार्थियों के खिलाफ वह आदेश जारी कर दिया। यह बेवजह नहीं है कि बीसीआइ के उस फैसले के जारी होने की प्रक्रिया पर सवाल उठे और उसके मनमाने रवैये पर जवाबदेही तय करने की मांग की गई। दरअसल, यह एक तरह से बीसीआइ की ओर से अपने अधिकारों की सीमा का अतिक्रमण था और इसे विद्यार्थियों की अभिव्यक्ति को दबाने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा सकता है। इसलिए शीर्ष अदालत ने उचित ही बीसीआइ को उसकी सीमा की याद दिलाई है।
इंदौर। परदेशीपुरा थाना क्षेत्र के यशोदा द्वार परदेशीपुरा में रहने वाले 35 वर्षीय
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 14 सितम्बर 2026 के अंक में पृष्ठ 9 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें




