अधिवक्ता प्रमोद द्विवेदी ने रोजाना अपना रजिस्ट्री मुद्दा जो कूटरचित और फर्जी कागजातों का है वह उठाने का क्रम जारी रखा। अब मामला जनसुनवाई के माध्यम से कलेक्टर के पास पहुंचा। मामला निर्मला देवी पति विशनदास सचदेव ने अपने पुत्र लक्ष्मण सचदेव के साथ ग्राम बिलावली की रजिस्ट्री जो सन 2002 में गेंदाबाई पति तुकाराम और सिकन्दर पिता तुकाराम हिरवे से खरीदी थी। इस मामले में भी शिकायत हुई कि कागजात फर्जी और कूटरचित है। रजिस्ट्री में स्टाम्प भी कम लगाए गए। इस मामले में कोषालय ने लक्ष्मण सचदेव को प्रमाण-पत्र भी स्टाम्प का जारी किया। द्विवेदी ने बताया कि लक्ष्मण सचदेव ने पांच से अधिक दस्तावेज साक्ष्य के रूप में एक हजार के स्टाम्प के भी सबूत के रूप में एकत्रित किए हैं जो इस दस्तावेज में लगे 1000के स्टाम्प से भिन्न है पहले मप्र तथा स्टाम्प नंबर 1000के स्टाम्प पर नहीं लगे होते थें इसमें लगे हुए हैं। सबसे अहम् जो स्टाम्प कोषालय से 2013में जारी हुआ वो 2002की रजिस्ट्री में मां और बेटे ने कैसे लगाया। अल्पना तिवारी पति प्रदीप कुमार तिवारी ने निर्मला बाई से 2007में इस संपत्ति को बेचने का करार किया फिर लगातार मामला न्यायालय में चला। निर्मला बाई ने डिग्री ली तो अल्पना तिवारी उच्च न्यायालय गई फिर उच्च न्यायालय में भी निर्मला बाई को स्थगन आदेश मिला। अल्पना तिवारी का निधन2021में हुआ फिर 2022 में उनके पति प्रदीप कुमार तिवारी ने निर्मला बाई से समझौता किया और कब्जा दिया।
अभी कुछ दिनों पहले गेंदाबाई एवं उनके पुत्र कुछ लोगों के साथ संपत्ति पर कब्जा करने पहुंचे तो मामला थाने में गया। गेंदाबाई एवं उनके पुत्र ने तहसीलदार का नामांतरण आदेश डायवर्सन आदेश एसडीएम का तथा रजिस्ट्री की सत्यापित कापी एवं नकल पेश की तो निर्मला बाई ने माथा पकड़ लिया। सवाल यह था कि अल्पना तिवारी एवं उसके पति सालों से न्यायालय के चक्कर लगा रहे लगातार उच्च न्यायालय में भी जाते रहे अगर वे किसी को 2002में रजिस्ट्री कर चुके होते तो वह क्या नामांतरण नहीं करवाता, कब्जा लेने नहीं आता। अल्पना तिवारी की मौत के बाद कैसे रजिस्ट्री सामने आई, तहसीलदार ने 24साल बाद कैसे नामांतरण किया, रजिस्ट्री कार्यालय में कैसे रिकार्ड रूम
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 15 सितम्बर 2026 के अंक में पृष्ठ 4 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें




