कर दिया है। कोई भी सरकारी योजना शुरू करने से पहले लाभार्थियों को केंद्र में रखकर उसके लिए नियम-शर्तें तय की जाती हैं। इसी आधार पर पात्र लोगों का चयन कर संबंधित योजना का लाभ उन तक पहुंचाया जाता है। मगर किसी योजना को चुनाव से ठीक पहले लागू किया जाए और उसी सरकार के फिर से राज्य में कमान संभालने के बाद अगर बड़ी संख्या में लोगों को पात्रता की सूची से बाहर कर दिया जाए, तो उस पर सवाल उठना स्वाभाविक है। महाराष्ट्र में भी कुछ ऐसा ही हुआ है। खबरों के मुताबिक, राज्य सरकार ने ‘मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहिन योजना’ से नब्बे लाख से ज्यादा महिलाओं को बाहर कर दिया है। यानी इन महिलाओं को पहले इस योजना का लाभ दिया जा रहा था, लेकिन अब वे या तो पात्रता के मानदंडों को पूरा नहीं कर पाई हैं या फिर ई-केवाईसी प्रक्रिया को पूरा न कर पाने की वजह से उनका नाम सूची से हटा दिया गया है। ऐसे में अहम सवाल यह है कि क्या इस योजना में नई नियमावली जोड़ी गई है! अगर ऐसा नहीं है, तो फिर क्या वजह है कि जो महिलाएं पहले पात्र थीं, अब वे अपात्र हो गई हैं? गौरतलब है कि महाराष्ट्र सरकार ने विधानसभा चुनावों से कुछ समय पहले जून, 2024 में इस योजना को मंजूरी दी थी। इसके तहत 21 से 65 वर्ष की आयु की पात्र महिलाएं प्रति माह डेढ़ हजार रुपए की आर्थिक सहायता प्राप्त कर सकती हैं। इस योजना में राज्य की 2.4 करोड़ महिलाओं को शामिल किया गया था। मगर अब फिर से सत्तासीन हुई महायुति सरकार ने ई-केवाईसी प्रक्रिया के तहत लाखों महिलाओं के नाम इस योजना से बाहर कर दिए हैं। सवाल है कि शुरू में इन महिलाओं को किस आधार पर पात्र घोषित किया गया था? क्या तब दस्तावेजों की जांच सही ढंग से नहीं की गई थी या फिर इसके पीछे इससे चुनावी लाभ उठाने की मंशा थी? हालांकि सरकार का दावा है कि पचास से पचपन लाख महिलाएं तय समय सीमा में ई-केवाईसी प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाई। मगर इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि कम शिक्षित और विशेष रूप से ग्रामीण महिलाएं ई-केवाईसी की बारीकियों को नहीं समझ पाती हैं। ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी है कि इस कार्य में उनकी सहायता के लिए पर्याप्त बंदोबस्त किए जाएं। राज्य सरकार के मुताबिक, लगभग बारह लाख महिलाओं की वार्षिक पारिवारिक आय इस योजना की निर्धारित सीमा से अधिक पाई गई। जबकि पैंतालीस लाख से अधिक महिलाएं पैंसठ वर्ष की ऊपरी आयु सीमा को पार कर चुकी थीं। हैरत की बात तो यह है कि सरकारी आंकड़ों के अनुसार करीब चौदह हजार पुरुष भी महिला बनकर इस योजना का लाभ ले रहे थे, जिन्हें अब बाहर कर दिया गया है। इससे स्पष्ट है कि सरकारी योजनाओं में पात्रता मानदंडों की जांच में किस कदर लापरवाही बरती जाती है।
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 14 जुलाई 2026 के अंक में पृष्ठ 9 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें




