इंदौर के व्यस्त व्यापारिक बाजारों में यातायात अव्यवस्था अब केवल आम नागरिकों की परेशानी नहीं रह गई है, बल्कि व्यापार की गति को भी प्रभावित कर रही है। संकरी सड़कों पर बेतरतीब खड़े ऑटो और ई-रिक्शा, सड़कों पर कब्जा जमाए वाहन और पार्किंग के अभाव में परेशान ग्राहक बाजारों की रोजमर्रा की तस्वीर बन गए हैं। सवाल यह है कि जिन बाजारों से सरकार को करोड़ों रुपए का राजस्व मिलता है, वहां यातायात की जिम्मेदारी केवल सामान्य यातायात पुलिस के भरोसे क्यों छोड़ी जाए? क्या व्यापारिक बाजारों के लिए अलग यातायात नियंत्रण दल की व्यवस्था जरूरी नहीं है?
बाजार की परेशानी, की अनदेखी-
खजूरी बाजार, सराफा, मारोठिया बाजार, बाजार और प्रबंधन व्यवस्था राजवाड़ा, सीतलामाता आसपास के व्यस्त व्यापारिक क्षेत्रों में खरीदारी के लिए आने वाले लोगों को कई बार दुकान तक पहुंचने से पहले ही जाम से जूझना पड़ता है। ऑटो और ई- रिक्शा चालक सवारी बैठाने या उतारने के लिए जहां जगह मिलती है, वहीं वाहन रोक देते हैं। कई स्थानों पर लंबे समय तक खड़े वाहन सड़क की चौड़ाई कम कर देते हैं। नतीजा यह कि पीछे वाहनों की कतार लग जाती है और पैदल चलने वालों के लिए भी रास्ता मुश्किल हो जाता है। इसका असर सीधे व्यापार पर पड़ता है। ग्राहक बाजार में आने से कतराने लगते हैं, दुकानदारों का समय खराब होता है और आपात स्थिति में एंबुलेंस या अन्य जरूरी वाहनों के निकलने तक का रास्ता बाधित हो सकता है। व्यापारियों की समस्या केवल दुकान के सामने वाहन खड़े होने तक सीमित नहीं है, बल्कि बाजार तक सहज पहुंच और सुरक्षित आवाजाही भी इससे जुड़ी है।
सामान्य यातायात व्यवस्था से कैसे चलेगा
काम? – यातायात पुलिस पर शहर के चौराहों, मुख्य मार्गों, दुर्घटनाओं और वीआईपी आवाजाही जैसी कई जिम्मेदारियां हैं। सीमित संसाधनों और कर्मचारियों के बीच हर बाजार की गली, प्रवेश मार्ग और पार्किंग स्थल पर लगातार निगरानी करना आसान नहीं है। ऐसे में केवल चालान बनाकर समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं। जरूरत इस बात की है कि प्रमुख व्यापारिक क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति, दुकानों की संख्या, ग्राहकों की आवाजाही और वाहनों के दबाव को ध्यान में रखकर अलग व्यवस्था बनाई जाए। बाजारों में यातायात नियंत्रण दल तैनात हो, जो केवल जाम खुलवाने तक सीमित न रहे, बल्कि अवैध पार्किंग रोकने, ऑटो-ई-रिक्शा के लिए निर्धारित स्थान तय करने और पैदल रास्तों को बाधामुक्त रखने की जिम्मेदारी भी निभाए।
बाजार के लिए बाजार- केंद्रित व्यवस्था- प्रमुख
बाजारों के प्रवेश और निकास मार्गों पर प्रशिक्षित यातायात कर्मियों की तैनाती हो। ऑटो और ई-रिक्शा के लिए निर्धारित पिकअप-ड्रॉप पॉइंट बनाए जाएं। नो-पार्किंग क्षेत्रों में नियमित निगरानी हो और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर समान रूप से कार्रवाई की जाए। व्यापारिक संगठनों, नगर निगम और यातायात पुलिस की संयुक्त समिति बनाकर प्रत्येक बाजार की समस्याओं का स्थायी समाधान निकाला जा सकता है। व्यापारियों को भी इस व्यवस्था का सहयोगी बनाया जाए। बाजारों के प्रतिनिधियों से नियमित संवाद हो, ताकि सड़क, पार्किंग और लोडिंग- अनलोडिंग से जुड़ी समस्याओं की पहचान समय रहते की जा सके।
सवाल व्यवस्था का नहीं, प्राथमिकता का है- इंदौर को
स्वच्छता के साथ सुव्यवस्थित यातायात के लिए भी पहचान बनानी है। इसके लिए जरूरी है कि व्यापारिक बाजारों को केवल राजस्व देने वाले क्षेत्र के रूप में नहीं, बल्कि शहर की आर्थिक धड़कन के रूप में देखा जाए। जब बाजारों में ग्राहक पहुंचने से पहले जाम से लड़ता है, तब इसका नुकसान व्यापारी, नागरिक और शहर तीनों को होता है। सवाल सीधा है जब बाजारों की समस्याएं अलग हैं, तो उनके यातायात प्रबंधन की व्यवस्था अलग और प्रभावी क्यों नहीं हो सकती? क्या प्रशासन किसी बड़ी दुर्घटना या गंभीर विवाद का इंतजार करेगा, या समय रहते बाजार-केंद्रित यातायात नियंत्रण दल बनाकर समस्या का समाधान करेगा? अब जरूरत आश्वासनों की नहीं, जमीन पर दिखाई देने वाली व्यवस्था की है।
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 13 अक्टूबर 2026 के अंक में पृष्ठ 10 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें



