कल दिनांक 28 से 30 सितंबर तक सरकारी बैंकों ने पांच दिवसीय सप्ताह को लेकर तीन दिनी की लम्बी हड़ताल का आव्हान किया है। इससे कमजोर और निचला वर्ग ही ज्यादा प्रभावित होगा क्योंकि उच्च एवं उच्च मध्यम वर्ग के लोगों ने अपने अधिकांश खाते प्राइवेट बैंको में खोल रखे है जो सरकारी बैंको से अच्छी सेवाएं प्रदान करते हैं बदले में वे उन सेवाओं का शुल्क भी वसूल करते है जो कमजोर वर्ग के बूते से बाहर हैं। कमजोर वर्ग जो पहले साहूकारों और ब्याज बट्टे का काम करने वालों के चंगुल में फसा रहता था सरकार ने उन्हें जनधन योजना में जीरो बैलेंस खाते खुलवा कर उन्हें साहूकारों से मुक्ति दिलाने का प्रयास कर उन्हें सरकारी बैंकों से जोड़ा है। अब यह कमजोर दैनिक मजदूरी करने वाला तबका बैंकों से जुड़ कर इन सरकारी बैंको में अपना काम काज करता है। अपनी सारी जमा राशि सुरक्षा बतौर सरकारी बैंकों में ही जमा रखता हैं ऐसे में तीन दिन की बैंकों की हड़ताल इन पर अच्छा खासा असर डालेगी। सरकारी बैंकों की यह हड़ताल वेतन भते या किसी आर्थिक सुविधाओं में वृद्धि को लेकर ना होकर बैंको में पाँच दिवसीय सप्ताह लागू करने को लेकर को लेकर हो रही है। बैंको में पाँच दिवसीय सप्ताह लागू करने से एक विसंगति यह भी है कि यदि शुक्रवार और सोमवार को अन्य कोई शासकीय छुट्टी आने पर बैंक लगातार चार दिन तक बंद हो सकते हैं और पूरे देश की बैंको की क्लीरिंग व्यवस्था चार दिन के लिये ठप्प हो सकती हैं। संगठित वर्ग के कर्मचारी अपनी जरूरी और गैर जरूरी सभी मांगो के लिये हड़ताल का हथियार उठा लेते है जबकि असंगठित वर्ग अपनी अत्यंत आवश्यक मांगों के। लिये भी केवल गुहार लगाता रहता है। दैनिक म़जदूरी करने वाले असंगठित वर्ग ने अपनी मजदूरी बढाने के लिए कभी हड़ताल नहीं की, इन्ही के समान काम करने वाले सहकारी बैंकों ने कभी पूरे देश में एक साथ हडताल का आव्हान नहीं किया जबकि उनके वेतन भत्ते सरकारी बैंकों से काफी कम है पर उनका संगठन सरकारी बैंको के संगठन की तरह मजबूत नहीं है। सरकारी बैंकों के कामके घंटे भी निश्चित है। वेतन भत्ते भी पर्याप्त है, इसके विपरीत निजी एवं सहकारी बैंकों के कर्मचारियोको बिना ओवर टाइम वेतन के सरकारी बैंकों से अधिक समय तक काम करते देखा गया है। यदि सरकार ने इनकी पांच दिन के सप्ताह की या दो दिन सरकारी बैंक बन्द रखने की मांग मान ली तो सप्ताह में दो दिन सरकारी बैंक बन्द रहेंगे नतीजा बैंको के क्लीयरिंग चेक जमा होने में देरी हो सकती हैं जो पूरे देश के व्यापार व्यवसाय को प्रभावित करेगा। बैंक कर्मचारियों को तो सप्ताह में दो दिन की छुट्टी मिल सकती हैं। यदि निजी और सहकारी बैंक पूरे सप्ताह काम करने का निर्णय लेते है तो उनके अच्छे व्यापारिक ग्राहक जिनको पूरे सप्ताह बैंकिंग सुविधा की आवश्यकता होती हैं वे निजी और सहकारी बैंकों की ओर जा सकते है जिससे सरकारी बैंकों की आर्थिक हालत और पतली हो सकती हैं। सप्ताह में दो दिन छुट्टियों का इसका ज्यादा असर कमजोर वर्ग पर ही पड़ेगा जिनके जीरो बैलेंस खाते सरकारी बैंकों में है और वे पूरी तरह अपनी जमा एवं नकदी निकासी के लिये इन बैंको पर ही निर्भर हैं। अब यह सरकार पर निर्भर करता है कि वह कमजोर वर्ग की बैंकिंग सुविधाओं में कटौती कर बैंक कर्मचारियों की मांग मंजूर करना चाहती है या निचले वर्ग के लिए बैंकिंग सुविधा बरकरार रखकर सप्ताह भर उन्हें बैंकिंग सुविधा प्रदान करना चाहती है।
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 27 सितम्बर 2026 के अंक में पृष्ठ 9 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें




