मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026
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146 लाख करोड़ का बोझ-कांग्रेस

यूपीआई लेन-देन पर एमडीआर के नाम पर आम जनता पर पड़ने वाले संभावित बोझ को लेकर प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता आनंद जैन कासलीवाल ने कहा की 75 प्रतिशत ट्रांजैक्शन 2000 के…

यूपीआई लेन-देन पर एमडीआर के नाम पर आम जनता पर पड़ने वाले संभावित बोझ को लेकर प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता आनंद जैन कासलीवाल ने कहा की 75 प्रतिशत ट्रांजैक्शन 2000 के होते हैं तो 25 परसेंट के हिसाब से भी 9000 करोड़ का बोझ इस देश की जनता पर यूपीआई ट्रांजैक्शन करने पर पड़ेगा। आज देश में डिजिटल और यूपीआई लेन-देन तेजी से बढ़ रहा है। सरकार की ओर से यूपीआई को बढ़ावा दिया गया है और आम जनता भी रोजमर्रा के भुगतान के लिए इसका व्यापक इस्तेमाल कर रही है। ऐसे में यूपीआई लेन-देन पर एमडीआर लागू किए जाने की चर्चा स्वाभाविक रूप से आम उपभोक्ता और छोटे व्यापारियों के लिए चिंता का विषय है। देश में मोटे तौर पर तौर प्रतिदिन 100 करोड़ के यूपीआई लेन-देन होता है। प्रतिदिन यूपीआई लेन-देन 100 करोड़ 30 दिन में 3,000 करोड़, 365 दिन में 36,500 करोड़ 0.4 प्रतिशत एमडीआर की दर से 36,500 करोड़ का 0.4 प्रतिशत 146 करोड़ प्रतिवर्ष अर्थात, यदि पूरे 36,500 करोड़ के वार्षिक लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर लागू हो, तो एमडीआर की गणना के अनुसार राशि 146 करोड़ रु. प्रतिवर्ष होगी। जैसा कि सरकार कह रही है कि 25% ही ट्रांजैक्शन 2000 के ऊपर के होते हैं उसमें भी 9000 करोड रुपए की जनता को एमडीआर चार्जेस के नाम पर वसूले जाएंगे। सरकार की ओर से यह कहा जा रहा है कि लगभग 96% लेन-देन एमडीआर के दायरे से बाहर रहेंगे। लेकिन कांग्रेस का सवाल है कि वास्तविक जीवन में इसका प्रभाव केवल कागज पर एमडीआर के दायरे में आने वाले लेन-देन की संख्या से नहीं समझा जा सकता। आज महंगाई के दौर में बड़ी संख्या में उपभोक्ताओं की खरीदारी 2,000 रु. से अधिक की होती है। ऐसे में यदि किसी लेन-देन पर व्यापारी को एमडीआर देना पड़ता है, तो यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि उसका आर्थिक भार अंततः कौन उठाता है। व्यापारी के सामने एमडीआर जैसी अतिरिक्त लागत आने पर उसके पास कीमतों, मार्जिन अथवा अन्य व्यावसायिक खर्चों में बदलाव करने के विकल्प हो सकते हैं। इसलिए यह कहना कि ग्राहक से सीधे एमडीआर नहीं लिया जाएगा, अपने आप में यह प्रमाण नहीं है कि इसका अप्रत्यक्ष आर्थिक प्रभाव आम उपभोक्ता पर नहीं पड़ेगा। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार एक तरफ करों और शुल्कों में राहत देने की बात करती है, जबकि दूसरी ओर डिजिटल लेन-देन की लागत के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक बोझ बढ़ाने की व्यवस्था की जा रही है। सरकार यदि यह कहती है कि श्अीं से उसे प्रत्यक्ष राजस्व प्राप्त नहीं होगा, तब भी कांग्रेस का सवाल है कि यदि व्यापारी की लागत बढ़ती है और वह लागत वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमतों में शामिल होती है, तो उसका अंतिम प्रभाव उपभोक्ता पर पड़ सकता है। इसलिए सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि:

1. एमडीआर की वास्तविक दर और दायरा क्या होगा?

2. इसका भुगतान किस पक्ष द्वारा किया जाएगा? 3. क्या किसी भी परिस्थिति में यह लागत ग्राहक तक पहुँच सकती है?

4. छोटे व्यापारियों पर इसका वास्तविक आर्थिक प्रभाव क्या होगा?

5. सरकार इस व्यवस्था के कारण उपभोक्ताओं पर पड़ने वाले अप्रत्यक्ष प्रभाव की निगरानी कैसे करेगी? कुल मिलाकर छोटे व्यापारियों और आम उपभोक्ताओं पर यह बोझ पड़ेगा जिससे आम आदमी महंगाई से त्रस्त है और उस पर यह चार्ज और उसकी परेशानी का कारण बनेगा। सरकार उनकी परेशानी को तो दूर नहीं कर रही है मध्यम वर्गीय व्यापारियों और व्यक्तियों की और बढ़ा रही है और जनता के सामने गलत आंकड़ों को पेश कर रही है। उक्त पूर्ण जानकारी प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता आनंद जैन कासलीवाल ने दी।

यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 13 अक्टूबर 2026 के अंक में पृष्ठ 3 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें

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सिटी ब्लास्ट, 13 अक्टूबर 2026, पृष्ठ 3