त्योहारों का मौसम बाजारों में रौनक और कारोबार में तेजी लेकर आता है, लेकिन इस चमक के पीछे आम आदमी की आर्थिक परेशानी लगातार गहराती दिखाई दे रही है। महंगा राशन, ईंधन, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं पर बढ़ता खर्च उसकी कमर तोड़ रहा है। ऊपर से मकान, वाहन और दूसरे ऋणों की ईएमआई ने मासिक बजट को जकड़ रखा है।
स्थिति यह है कि परिवार अब केवल बचत में कटौती नहीं कर रहे, बल्कि उनकी पूरी लाइफस्टाइल चरमराने लगी है। कमाई सीमित, खर्च बेकाबू! – आम आदमी की आय का बड़ा हिस्सा महीने की शुरुआत में ही राशन, बिल, बच्चों की फीस, परिवहन और ईएमआई में निकल जाता है। महीने के अंत तक बची रकम से जरूरतें पूरी करना चुनौती बन जाता है।
कहीं बाहर खाना बंद, कहीं घूमने की योजना रद्द, तो कहीं कपड़े और घरेलू सामान की खरीदारी टाल दी जाती है। त्योहारों पर भी खरीदारी अब इच्छा से नहीं, जेब की हैसियत देखकर हो रही है। चिंता केवल इतनी नहीं कि वस्तुएं महंगी हो रही हैं। असली संकट तब पैदा होता है, जब आय की वृद्धि खर्चों की रफ्तार का मुकाबला नहीं कर पाती। ऐसे में आम परिवार की वास्तविक क्रयशक्ति कमजोर पड़ती है और जीवन की गुणवत्ता पर सीधा असर होता है।
बाजार में भीड़, लेकिन खरीदारी कितनी? – त्योहारी
सीजन में बाजार सजते हैं, विज्ञापनों में छूट की बौछार होती है और कारोबारियों को बिक्री बढ़ने की उम्मीद रहती है। लेकिन ग्राहक की जेब में पैसा ही सीमित हो, तो आकर्षक ऑफर भी खरीदारी की गारंटी नहीं बन सकते। ग्राहक बाजार पहुंचता है, कीमत पूछता है, विकल्प देखता है और कई बार खरीदारी टालकर लौट जाता है। इसका असर खुदरा व्यापार से लेकर थोक कारोबार, परिवहन और छोटे उद्योगों तक पहुंच सकता है।
महंगाई से परेशान उपभोक्ता खर्च घटाता है, तो बाजार की मांग पर दबाव बढ़ने की आशंका रहती है। हालांकि, वास्तविक स्थिति का आकलन बिक्री के ताजा आंकड़ों से ही किया जाना चाहिए।
आर्थिक विकास का लाभ आखिर किसे? – अर्थव्यवस्था
की मजबूती केवल विकास दर, निवेश या बाजार के कुल कारोबार से नहीं मापी जा सकती। यह भी देखना होगा कि आम नागरिक की आय कितनी बढ़ी, आवश्यक खर्चों के बाद उसके पास कितना पैसा बचा और वह बिना अतिरिक्त कर्ज लिए अपनी जरूरतें पूरी कर पा रहा है या नहीं। महंगाई पर नियंत्रण, रोजगार और आय के अवसरों में वृद्धि तथा छोटे कारोबारों को मजबूती देना समय की जरूरत है।
केवल त्योहारों की बिक्री बढ़ाने के प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे, जब तक आम आदमी की खरीदने की क्षमता मजबूत नहीं होती। सवाल सीधा है जब आम आदमी राशन, ईंधन, जरूरी बिलों और ईएमआई के बीच अपनी इच्छाओं का गला घोंटने को मजबूर हो, तब बाजार की रौनक को आर्थिक खुशहाली का पैमाना कैसे माना जाए? त्योहारों की असली खुशी महंगे विज्ञापनों और सजे बाजारों में नहीं, बल्कि उस परिवार की मुस्कान में है, जो अपनी जरूरतें पूरी करने के बाद भी भविष्य के लिए कुछ बचा सके।
यदि आम आदमी की जेब लगातार कमजोर होती रही, तो त्योहारों की चमक तो दिखाई देगी, लेकिन उसके पीछे आर्थिक बेचैनी का अंधेरा गहराता जाएगा।
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 22 अक्टूबर 2026 के अंक में पृष्ठ 4 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें




