जिटल मंचों पर लोकप्रियता हमेशा नहीं रहती, लेकिन उसके लिए उठाया गया गलत कदम खुद के या परिवार के लिए जीवन भर का पछतावा बन सकता है। उत्तर प्रदेश के वाराणसी में बीते सोमवार को विंध्याचल धाम से लौट रहे चार युवकों की ट्रक की टक्कर से मौत हो जाने की घटना ने एक बार फिर इस सवाल की गंभीरता को उजागर किया है कि आखिर कुछ पल की तस्वीर या वीडियो बनाने के जुनून में अपनी जिंदगी को दांव पर क्यों लगा दिया जाता है! यह हादसा उस वक्त हुआ, जब ये युवक प्रयागराज-वाराणसी राजमार्ग पर कार खड़ी करके मोबाइल फोन से सेल्फी ले रहे थे। आज के सोशल मीडिया के दौर में तस्वीरों और वीडियो के जरिए अपनी गतिविधियां साझा करके प्रचार पाने की होड़ लगी है। मगर समस्या तब पैदा होती है, जब लोग अपनी इस चाह में खुद की सुरक्षा की बुनियादी समझ को भी ताक पर रख देते हैं। कभी ऊंचे पहाड़ों की चोटियों पर, कभी समुद्र की लहरों के बीच, तो कभी रेलवे पटरियों और व्यस्त सड़कों पर वीडियो बनाते वक्त हादसे में जान जाने की घटनाएं अक्सर सामने आती रहती हैं। अहम सवाल यह है कि इस तरह की जोखिम भरी गतिविधियों पर अंकुश कैसे लग पाएगा? इसमें दोराय नहीं कि सोशल मीडिया के जरिए सूचनाओं का प्रसार और निजी विचारों की अभिव्यक्ति आसान हो गई है। मगर, इस तकनीक के प्रति जुनून और अनियंत्रित इस्तेमाल कई तरह के जोखिम भी पैदा करता है। सोशल मीडिया पर अपनी गतिविधियों से जुड़ी नई-नई तस्वीरें और साहसी वीडियो डालने की जरूरत से ज्यादा सक्रियता भी नुकसानदेह हो सकती है। डिजिटल मंचों पर लोकप्रियता हमेशा नहीं रहती, लेकिन उसके लिए उठाया गया गलत कदम खुद के या परिवार के लिए जीवन भर का पछतावा बन सकता है। इस समस्या का समाधान किशोरों या युवाओं को दोष देने से नहीं, बल्कि उन्हें तकनीक के नियंत्रित इस्तेमाल को लेकर सजग बनाने से होगा। इसमें परिवार, समाज और शिक्षण संस्थान अहम भूमिका निभा सकते हैं। विद्यालयों में सड़क सुरक्षा तथा डिजिटल व्यवहार को लेकर जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए। सोशल मीडिया पर खतरनाक करतबों को महिमामंडित करने के बजाय उनके वास्तविक परिणामों के प्रति सचेत करने वाली सामग्री को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। यही नहीं, डिजिटल मंचों की भी यह जिम्मेदारी है कि वे उपयोगकर्ताओं का सही मार्गदर्शन करें।
यह खबर सिटी ब्लास्ट ई-पेपर के 22 अक्टूबर 2026 के अंक में पृष्ठ 9 पर प्रकाशित हुई है। पूरा ई-पेपर पढ़ें




